वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे, जानिए क्या है VRINDAVAN DHAM की महिमा

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Vrindavan Dham
Vrindavan dham-holy play place for lord krishna, sacred place of pilgrimage

विश्व के सभी स्थानों में  Vrindavan Dham को सर्वोच्च स्थान माना गया है.  हिंदू धर्म में Vrindavan Dham को काफी पवित्र माना जाता है. Vrindavan Dham ही वो जगह है जहां Lord Krishna ने यमुना नदी के किनारे अपना बचपन बिताया था.




“वृन्दावन का आध्यात्म अर्थ है”-“वृन्दाया तुलस्या वनं वृन्दावनं” तुलसी का विशेष वन होने के कारण इसे वृन्दावन कहते हैं. वृन्दावन ही वो पवित्र स्थान है जहां भगवान कृष्ण ने राधा के सात रासलीला करके प्रेम का संदेश दिया था. भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ होली भी यहीं खेली. इसलिए यहां की होली की खास विशेषता मानी जाती है.

 

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जानिए क्या है Vrindavan Dham की महिमा

वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहां प्रिया-प्रियतम ने अपनी दिव्य लीलाएं की हैं. इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते. ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहां के प्रेम के आगे फ़ीका पड़ जाता है.




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Vrindavan Dham रसिकों की राजधानी है. यहां के राजा श्यामसुन्दर (श्रीकृष्ण जी) और महारानी श्री राधिका जी हैं. इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है. सभी धामों से ऊपर है ब्रज धाम और सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है श्री वृन्दावन.

वृन्दावन की महिमा का बखान करता एक प्रसंग है इस प्रकार है…

भगवान नारायण ने प्रयाग को तीर्थों का राजा बना दिया. सभी तीर्थ प्रयागराज को कर देने आते थे. एक बार नारद जी ने प्रयागराज से पूछा- क्या वृन्दावन भी आपको कर देने आता है?

तीर्थराज ने नकारात्मक उत्तर दिया. तो नारद जी बोले फ़िर आप तीर्थराज कैसे हुए? इस बात से दुखी होकर तीर्थराज  भगवान के पास पहुंचे. भगवान ने प्रयागराज के आने का कारण पूछा.




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तीर्थराज बोले- प्रभु, आपने मुझे सभी तीर्थों का राजा बनाया है. सभी तीर्थ मुझे कर देने आते हैं, लेकिन श्री वृन्दावन कभी कर देने नहीं आए इसलिए मेरा तीर्थराज होना अनुचित है.

भगवान ने प्रयागराज से कहा- तीर्थराज, मैंने तुम्हें सभी तीर्थों का राजा बनाया है. अपने निज गृह का नहीं. वृन्दावन मेरा घर है. यह मेरी प्रिया श्री किशोरी जी (राधा जी) की विहार स्थली है. वहां की अधिपति तो वे ही हैं. मैं भी सदा वहीं निवास करता हूं. वह तो आप से भी ऊपर है.

कहा जाता है..

एक बार अयोध्या जाओ

दो बार द्वारिका

तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे

चार बार चित्रकूट

नौ बार नासिक

बार-बार जाके बद्रिनाथ घूम आओगे

कोटि बार काशी

केदारनाथ रामेश्वर

गया-जगन्नाथ चाहे जहां जाओगे

होंगे प्रत्यक्ष जहां दर्शन श्याम श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे.

कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है इसमें जो वास करता है.

भगवान की गोदी में ही वास करता है. परन्तु श्री राधारानी की कृपा से ही यह गोदी प्राप्त होती है. (“कृपयति यदि राधा बाधिता शेष बाधा”)

वृहद्गौतमीयतन्त्र में भगवान ने अपने श्रीमुख से यहाँ तक कहा है कि यह रमणीय वृन्दावन मेरा गोलोक धाम ही है. (“इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम”)

 

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