ATAL BIHARI VAJPAYEE- उनकी सरकार की डूबती-उतरती नैया में किन तीन देवियों की थी बड़ी अहम भूमिका ?

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Atal Bihari Vajpayee
Atal Bihari Vajpayee

देश के पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee नहीं रहे. उनके लिए पूरा देश दुआ कर रहा था लेकिन इन दुआओं से बेखबर Atal Bihari Vajpayee ने आज शाम 5 बजकर 5 मिनट पर अंतिम सांस ली.  वे जून से एम्स में भर्ती थे और उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी. उन्हें देखने के लिए सभी बड़े नेता एम्स पहुंचे थे.




भारतीय राजनीति में  Atal Bihari Vajpayee का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. उन्हें भारतीय राजनीति का शिखर पुरुष कहा जाता है. उनकी सरकार चलाने में तीन देवियों की भूमिका का जिक्र हमेशा होता है.

Atal Bihari Vajpayee पर लिखी Senior Journalist Vijai Trivedi की किताब ‘हार नहीं मानूंगा’ से हम वो प्रसंग आपको बता रहे हैं जिनसे उन तीन देवियों की भूमिका का जिक्र होता है…..

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी‘ की किताब  “हार नहीं मानूंगा” के कुछ अंश…..

Vajpayee  Government की डूबती उतराती नैया में तीन देवियों की भूमिका बड़ी अहम रही – तमिलनाडु की पूर्व  मुख्यमंत्री J Jayalalithaa, उत्तरप्रदेश की नेता और पूर्व मुख्यमंत्री Mayawati और पश्चिम बंगाल की नेता Mamata Banerjee.

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इन तीनों राजनीतिक देवियों से वाजपेयी सरकार का सिरदर्द लगातार बना रहा. सरकार कभी एक की मांगों को निपटाने में लगती तो कभी दूसरे की बातों पर सारा ध्यान लगाना होता और कभी तीसरी सरकार की बातों को अनसुना कर नई मुश्किलें खड़ी करतीं.

1-J. Jayalalithaa

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तमिलनाडु से एआईएडीएमके की नेता जयललिता की दोस्ती दरअसल बीजेपी नेता Lal Krishna Advani से थी. वाजपेयी को जयललिता के धुर विरोधी डीएमके के नेता M. Karunanidhi के करीबी माना जाता रहा है.




Atal Bihari Vajpayeeदोनों के बीच रिश्तों के कभी सहज न हो पाने की शायद यह एक बड़ी वजह से रही हो. 1996 में जब 13 दिन की वाजपेयी सरकार बनी थी, उस वक्त भी जयललिता को साथ लाने की कोशिशें की गई थीं लेकिन जयललिता तब तैयार नहीं हुई.

हालांकि उससे भी पहले 1994 में एक बड़ी तमिल पत्रिका ‘आनंनद वेंकटन’ ने लिखा,“बीजेपी मायने भारतीय जया पार्टी और एआईएडीएमके यानी आडवाणी इंडिया द्रमुक पार्टी”. इसकी एक बड़ी वज़ह ये मानी जाती रही कि आडवाणी और जयललिता हिन्दुत्व के चेहरे थे.

1998 के चुनावों में AIADMK को NDA में बीजेपी के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन गई तो उन्हें लगा कि अब तो उनकी बात मानी जाएगी. जयललिता के करीबी लोगों ने मुझे कहा कि यदि उस वक्त वाजपेयी सरकार जयललिता के ख़िलाफ़ कुछ आर्थिक मामलों को हटा लेती तो फिर न तो जयललिता को बाद में दो बार जेल जाना पड़ता और न ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ती और जयललिता के हिसाब से ये दोनों नाजायज़ मांग नहीं थी.

तमिलनाडु में उस वक्त डीएमके की सरकार थी और करुणानिधि मुख्यमंत्री थे. Atal Bihari Vajpayee के करुणानिधि से आपातकाल के वक्त से बेहतर संबंध थे और उनके विश्वस्त मुरासोली मारन से भी उनके बेहद अच्छे रिश्ते थे. वाजपेयी आपातकाल के दौरान जब जेल में थे तब करुणानिधि ने जनसंघ के नेताओं की बड़ी मदद की थी.

करुणानिधि उस वक्त मुख्यमंत्री थे. जयललिता चाहती थीं कि करुणानिधि सरकार को बर्खास्त किया जाए क्योंकि डीएमके सरकार ने उन्हें बहुत से मामलों में फंसा रखा है. बताया जाता है कि जयललिता तब अपने ऊपर लगे कई आर्थिक मामलों को बंद या ख़त्म कराना चाहती थीं, लेकिन वाजपेयी ने इससे इंकार कर दिया और कहा कि यह मुश्किल है, कानून अपना काम करेगा.

इसके साथ ही जयललिता पर सुब्रह्मनियम का वित्त मंत्री की कुर्सी के लिए दबाव था. वाजपेयी तब जसवंत सिंह को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे और इसी कारण जयललिता ने समर्थन की चिट्ठी सौंपने में काफी वक्त लगा दिया.

उस समय ये मज़ाक चलता रहा कि चिट्ठी आ रही है… चिट्ठी आने वाली है… चिट्ठी आ गई है! राष्ट्रपति शपथ दिलाने से पहले समर्थन की चिट्ठी चाहते थे और उस चिट्ठी प्रकरण में काफी वक्त भी लग गया. समर्थन की चिट्ठी देने के बाद भी जयललिता की नाराज़गी और दबाव बना रहा.

उन्हें मनाने के लिए वाजपेयी ने कभी George Fernandes को भेजा तो कभी जसवंत सिंह को.सरकार बने हुए अभी पांच महीने बीते थे कि जयललिता ने वाजपेयी के लिए सिरदर्द बढ़ा दिया था. वाजपेयी ने पहले जार्ज फर्नाडिस को जयललिता को मनाने के लिए भेजा, फिर Jaswant Singh के साथ Pramod Mahajan भी गए.

लेकिन जयललिता प्रमोद महाजन को देखकर नाराज़ हो गई। वे महाजन को डीएमके नेता मुरासोली मारन का बिज़नेस पार्टनर समझती थी. तीन दिन तक जयललिता को मनाने के लिए बैठकें होती रहीं. वाजपेयी ने कई बार दिल्ली से फ़ोन पर जयललिता से बात की.




वरिष्ठ पत्रकार स्वप्न दासगुप्त बताते हैं कि जयललिता की कई मांगें थीं. उनमें प्रवर्तन निदेशालय के मुखिया एम. के. बेजुबरवा को हटाकर उनके पसंद के अफसर को लगाने की मांग थी, वाजपेयी ने बेज़बरवा को हटा दिया. इसके साथ ही राजस्व सचिव एन.के. सिंह को हटाकर सी.एम. वासदेवन को लगाने की मांग की.

वाजपेयी ने सिंह को हटाकर उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में लगा दिया और सिंह के स्थान पर प्रवर्तन निदेशालय के मुखिया रहे जावेद चौधरी को जब राजस्व सचिव बनाया तो जयललिता ने गुस्से में पूछा ये कौन है? वाजपेयी जयललिता की आए दिन की मांगों से तंग आ चुके थे, परेशान थे.

जयपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी, उसमें फ़ैसला होना था। कागज़ पर जयललिता सरकार के साथ थी लेकिन खेल ख़त्म हो गया था. स्वप्न के मुताबिक शादी ख़त्म हो चुकी थी, बस तलाक की औपचारिकता पूरी होनी थी.

जसवंत सिंह से भी जयललिता के अच्छे रिश्ते थे. 1999 में स्वामी की पार्टी में आए चाय के प्याले में तूफान के बाद जब जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया तो वाजपेयी ने अगले दिन कहा, “आज रात मैं चैन की नींद सो पाया”. वैसे एआईडीएमके के नेताओं का कहना है कि यदि वाजपेयी के बजाय आडवाणी प्रधानमंत्री होते तो शायद समर्थन वापसी की नौबत नहीं आती.

गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्जीक्यूटिव चल रही थी. जयललिता के सरकार से समर्थन वापसी की खबरें आ रही थीं. बैठक से पत्रकारों को बाहर कर दिया गया था. वरिष्ठ पत्रकार गौतम लाहिड़ी  के साथ दो तीन पत्रकार अंदर ही रुकने में कामयाब हो गए.

बैठक में भी जयललिता की वापसी और उसके बाद के राजनीतिक हालात पर चर्चा हुई। बैठक में जब चाय के लिए ब्रेक हुआ तो वाजपेयी बाहर आए. पत्रकारों ने उनसे शिकाय़ती अंदाज़ में कहा कि यहां चाय क्या, पीने का पानी भी नहीं है. वाजपेयी हंसे, फिर थोडे गंभीर अंदाज़ में आँखों को थोड़ा और बड़ा करते हुए कहा,“क्या करे पानी लायक ही स्थिति हो रही है आजकल”.

जयललिता ने वाजपेयी को कभी सहज नहीं रहने दिया. वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता ने बताया कि एक बार वे वाजपेयी से मिलने प्रधानमंत्री निवास गए तो देखा उनका मूड खराब था. मेहता ने पूछा,“क्या हुआ,सर?” वाजपेयी ने जवाब दिया, “नहीं, नहीं,कुछ नहीं. सवेरे-सवेरे जयललिता जी ने फ़ोन कर दिया.“

वाजपेयी को वैसे भी इस तरह के नेता पसन्द नहीं आते थे जो व्यवहार में लोकतांत्रिक नहीं हों और कभी भी बेवजह की मांग या शर्त रखने लगें. एक बार1999 में जयललिता रूठ गईंक्योंकि उन्हें लगा कि बीजेपी डीएमके के साथ रिश्ते बनाने की कोशिश कर रही है ऐसे में उन्हें मनाने के लिए विजय गोयल के घर पर डिनर का आयोजन किया गया था.

फिर वाजपेयी और जयललिता, दोनों को एक टेबल पर डिनर के लिए बिठाया गया. गोयल कहते हैं कि ज़ाहिर है जयललिता का गुस्सा तुरंत उतर गया, कम से कम कुछ दिनों के लिए तो शांत हो ही गईं. ऐसे ही जब 2001 में ममता बनर्जी रूठ गईं तो उऩसे मिलने और उन्हें मनाने के लिए विजय गोयल को कोलकाता भेजा गया.

2-Mamta Banerjee

जयललिता के अलावा दूसरी महिला नेता तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी एनडीए सरकार के लिए ज़्यादातर वक्त सिरदर्द बनीं रही, कभी मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर तो कभी मंत्रालयों में कामकाज के बंटवारे पर. वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय बताते हैं कि ममता जब रेल मंत्री थीं और हर दिन कोई न कोई मुसीबत खड़ी हो जाती.

एक बार पेट्रोल–डीजल के दामों में बढ़ोतरी को लेकर ममता नाराज़ हो गईं. संकट मोचक जार्ज फर्नांडिस को ममता को मनाने के लिए कोलकाता भेजा गया। जार्ज शाम से पूरी रात तक इंतज़ार करते रहे, लेकिन ममता ने मुलाक़ात नहीं की. इसके बाद एक दिन अचानक प्रधानमंत्री वाजपेयी ममता दी के घर पहुंच गए.

Atal Bihari Vajpayeeउस दिन ममता कोलकाता में नहीं थीं. वाजपेयी ने ममता की मां के पैर छू लिए और उनकी मां से कहा, “आपकी बेटी बहुत शरारती है, बहुत तंग करती है.“ फिर क्या था ,ममता दी का गुस्सा मिनटों में उतर गया.

वरिष्ठ पत्रकार और एसोसिएट संपादक गौतम लाहिड़ी बताते हैं कि नरसिंह राव सरकार के वक्त सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष थे. ममता बनर्जी तब पश्चिम बंगाल कांग्रेस की अध्यक्ष बनना चाहती थीं, लेकिन चचा केसरी तैयार ही नहीं हुए.

फिर 1996 में वाजपेयी की 13 दिन की सरकार के बाद जब देवेगौड़ा की सरकार बनी, उस वक्त जार्ज फर्नाडिंस ममता के सम्पर्क में थे. ममता तब कांग्रेस की सांसद थी. उन्होंने कांग्रेस सांसद के तौर पर देवेगौड़ा सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव रख दिया.

बाद में कांग्रेस ने उस अविश्वास प्रस्ताव को वापस लिया, जिससे कांग्रेस की काफी खिल्ली उड़ी. जार्ज फर्नाडिंस ममता बनर्जी को वाजपेयी से मिलाने ले गए तब वाजपेयी ने ममता को कहा, “आप तो फायरिंग लेडी हैं – यानी अग्निगणना.“

सबसे पहले वाजपेयी ने ही ममता का नाम ‘अग्निगणना’ रखा. वाजपेयी की इस पहल से ममता और वाजपेयी के बीच रिश्ते अच्छे हो गए. बाद में जब ममता ने तृणमूल कांग्रेस बनाई तो एनडीए से हाथ मिला लिया.

गौतम लाहिड़ी बताते हैं कि जनवरी 2001 में पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर के छोटा अंगाड़िया इलाके में हिंसा हो गई. इसमें तृणमूल कांग्रेस के 11 समर्थक मारे गए थे. आरोप था कि सीपीएम के लोगों ने यह हिंसा की है. ममता बनर्जी बहुत गुस्से में थीं.

वे पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टी की बुद्धदेब भट्टाचार्य की सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रही थी, लेकिन एनडीए सरकार में कोई सुनवाई नहीं हुई. ममता प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee से मिलने दिल्ली पहुंचीं और अपने झोले में से हडिड्यां और खोपड़ियां निकालने लगीं और एक-एक करके उन्हें वाजपेयी के सामने टेबल पर रखने लगीं.

वाजपेयी को यकायक समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. फिर वाजपेयी ने कहा कि ये तो वाकई गंभीर मामला है लेकिन राष्ट्रपति शासन लगाना तो गृह मंत्रालय का काम है, उनकी सिफारिश पर ही तो कैबिनेट फ़ैसला करेगी, इसलिए आप आडवाणी जी से मिलिए.

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फिर ममता गृह मंत्री आडवाणी से मिलीं. आडवाणी ने राष्ट्रपति शासन लगाने का भरोसा तो नहीं दिया, लेकिन सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. ममता नाराज़ हो गईं. उन्हें लगा कि वाजपेयी तो तैयार हैं लेकिन आडवाणी तैयार नहीं हुए क्योंकि उनकी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य से दोस्ती है.

मुख्यमंत्री बुद्धदेब ने केन्द्र सरकार को चुनौती दी कि अगर पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाकर राज्य सरकार को बर्खास्त करने की कोशिश की तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. अगले कुछ महीनों में पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले थे, ममता बनर्जी को लगने लगा कि बीजेपी के साथ रहकर चुनाव में जाने से राज्य में मुस्लिम वोटर को हासिल करना मुश्किल काम होगा.

ममता दी सरकार से बाहर निकलने का बहाना ढूंढ रहीं थी और वह मिला तहलका स्टिंग आपरेशन से. ममता ने तुरंत प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखते हुए कहा कि इस स्टिंग आपरेशन के बाद जार्ज फर्नाडिस को सरकार से और जया जेटली को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना चाहिए.

अपनी चिट्ठी में ममता ने लिखा कि हम नहीं चाहते कि किसी भी वजह से और किसी के कारण से प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचे, लेकिन जब उनकी मांग को प्रधानमंत्री ने मान लिया और 15 मार्च को जार्ज फर्नाडिस अपने इस्तीफे करने पहुंचे.

वहीं दूसरी तरफ एक प्रेस कान्फ्रेंस में ममता बनर्जी और उनके सहयोगी मंत्री अजीत पांजा ने अपने इस्तीफे और उनके 9 सासंदों ने सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान किया। ममता ने कहा कि अब हमें जार्ज के इस्तीफे से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमें लगता है कि इस स्टिंग आपरेशन से सरकार की छवि खराब हुई है.

एनडीए से बाहर निकलने के कुछ दिनों बाद ही ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के चुनावों में उसी कांग्रेस के साथ तालमेल कर लिया जिसे वे चार साल पहले 1997 में छोड़कर आई थीं, लेकिन 2001 के विधानसभा चुनावों में ममता का मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया.

294 सीटों वाली विधानसभा में लेफ्ट गठबंधन को 196 सीटें मिलीं जबकि ममता के गठबंधन को सिर्फ 98. उसमें तृणमूल के 60 विधायक चुन कर आए. चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी फिर से एनडीए में आने की कोशिश में लग गईं, लेकिन बीजेपी की राज्य इकाई इसके खिलाफ थी.  आखिर में 2004 में ममता एनडीए का हिस्सा हो गईं और कोयला मंत्री बनीं.

3-Mayawati

1998 की सरकार में जब विश्वास मत का मसला खड़ा हुआ तो पार्टी मैनेजर और नेता प्रमोद महाजन राजनीतिक दलों से बातचीत कर रहे थे. महाजन ने उस वक्त मुझे बताया था कि बीएसपी सुप्रीमो कांशीराम से भी बात कर ली है. बीएसपी के पांच सांसद थे.

Atal Bihari Vajpayeeतय हुआ कि बीएसपी विश्वास मत के ख़िलाफ़ वोट नहीं करेगी और ज़रुरत पड़ी तो वाक आउट करेगी. महाजन लगातार कांशीराम के सम्पर्क में थे। इससे मायावती को लगा कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और वे नाराज़ हो गईं. वैसे बीजेपी के नेता कुछ और कारण बताते रहे हैं.

1999 में विश्वास मत से पहले की रात उनका इरादा बदल गया और सरकार को ख़बर मिली कि बीएसपी विश्वास मत के ख़िलाफ़ वोट करेगी, लेकिन तब तक मायावती को मनाने के लिए बहुत देर हो गई थी. 1999 में विश्वास मत में हारने की एक बड़ी वजह मायावती का फ़ैसला भी था.

कोई और राजनेता होता तो शायद फिर दोबारा बात भी नहीं करता शायद, लेकिन वाजपेयी हमेशा राष्ट्र के बारे में, राज्य के बारे में और अपने लोगों के हित के बारे में सोचते थे. दरअसल वाजपेयी के रिश्ते बीएसपी सुप्रीमो कांशीराम से बेहद अच्छे रहे थे और जब पहली बार यूपी में बीजेपी-बीएसपी की सरकार बनी तब भी उसकी वजह वाजपेयी और कांशीराम ही थे.

इसके साथ ही वाजपेयी यह समझते थे कि बीएसपी का साथ मिलने से बीजेपी की सवर्ण पार्टी की छवि से थोड़ा आगे बढ़ा जा सकेगा. वाजपेयी की इसे राजनीतिक मजबूरी या समझदारी भी माना जा सकता है कि वे इस बात को खूब समझते थे कि यूपी में मुलायम सिंह के वोट बैंक से मुकाबले के लिए बीएसपी की ज़रुरत है और इस दोस्ती से दोनों पार्टियों की ताकत एक और एक मिलकर ग्यारह हो जाएगी.

(Courtsey- ‘Har Nahi Manoonga’- a book written by Senior Journalist Vijai Trivedi on Atal Bihari Vajpayee)

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