VAJPAEE ने इस तरह WAGHA BORDER पर दोस्ती के दरवाजे खोल कर इतिहास बना दिया

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Wagha Border
Atal Bihari Vajpayee and Nawaz Sharif created a history at Wagha Border (Pik Courtesy: HT)

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री  Atal Bihari Vajpayee और  पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म Nawaz Sharif दोनों ने मिल कर एक इतिहास रचा था. अटारी भारत पाक सीमा का आखिरी छोर– Wagha Border. जैसे ही वाघा बार्डर पर गेट खुले, टीवी चैनलों पर ख़बर दौड़ पड़ी.




Vajpayee और Nawaz शरीफ ने दोस्ती के दरवाज़े खोल कर इतिहास बना दिया. 20 फरवरी 1999 के दिन दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते में एक अहम कड़ी के तौर पर जुड़ गया.

Wagha BorderWagha Border पर Vajpayee ने अपने शानदार स्वागत के बीच कहा, “दिल्ली और लाहौर के बीच की यह बस सेवा सिर्फ सफर आसान करने के लिए नहीं है बल्कि ये दोनों मुल्कों के इस संदेश को ज़ाहिर कर रही है कि हमारे संबंध सुधरें और हम मिलजुल कर रहें.

Vajpayee ने कहा कि अगर यह सिर्फ एक बस होती तो दोनों मुल्कों ही नहीं पूरी दुनिया में इतनी हलचल और उम्मीदें पैदा नहीं करती. इसका मकसद तब पूरा होगा जब हम अविश्वास को पीछे छोड़ दें और भरोसा और भाईचारा पैदा करें, सहयोग के साथ आगे बढ़ें.”




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सीमा के दूसरी तरफ प्रवेश करते ही गार्ड ऑफ ऑनर, तोपों की सलामी, दी गई. पाकिस्तान के वज़ीरे आज़म  और Nawaz Sharif उनके भाई पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ वहां स्वागत के लिए तैयार खड़े थे.

Vajpayee  ने कहा,“21 साल बाद पाकिस्तान की ज़मीन पर आकर बेहतर महसूस कर रहा हूं। मैं भारत के लोगों की शुभकामनाएं और उम्मीदें लेकर आया हूं. मुझे वज़ीरे आज़म नवाज़ शरीफ साहेब के साथ कुछ ठोस कार्यक्रम और बातचीत की उम्मीद है.”




सीमा पर स्वागत के बाद जब हेलीकॉप्टर  वाजपेयी को लेकर उड़ा तो आसमान में रंग बिरंगी पतंगे उड़ रही थीं, शायद दोनों मुल्कों के बीच दोस्ती की नई ऊंचाइयों को छूने के लिए, लेकिन नीचे बाज़ार बंद थे. जमात ए इस्लामी की तरफ से विरोध प्रदर्शन था. ‘वाजपेयी वापस जाओ’ की तख्तियां लेकर भी कुछ लोग खड़े थे. वाजपेयी ने नवाज़ शरीफ को कहा कि परेशान मत होइए,ऐसा तो सब जगह चलता रहता है.

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी

प्रधानमंत्री के विशेष अधिकारी रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी ने बताया कि जमात ए इस्लामी ने धमकी देकर बाज़ार बंद करवा दिए थे. लोग बाज़ारों में न के बराबर थे. इससे वाजपेयी से ज़्यादा नवाज़ शरीफ निराश हुए थे. पंजाब गवर्नर हाउस के लॉन पर हेलीकॉप्टर उतरा. ज़मीन ठोस थी. शायद कोई संदेश दे रही थी.

लेकिन लाहौर यात्रा के वक्त वाघा बार्डर पर पाकिस्तान के तीनों सेना प्रमुख मौजूद नहीं थे. सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ ने अपनी नापसंदगी ज़ाहिर की थी. शायद वे सार्वजनिक तौर पर हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री को सलामी देना नहीं चाहते थे.

लेकिन जब लाहौर में गवर्नर हाउस में जलसा हुआ तो वहां तीनों सेना प्रमुख न केवल मौजूद थे बल्कि वाजपेयी को सलामी भी दी और फिर जब लाहौर फोर्ट में कार्यक्रम हुआ तो उसमें डिनर के वक्त सिर्फ हिंदी फिल्मों के गाने ही बजते रहे और खुद मुशर्रफ भी उसका मज़ा लेते रहे.

‘हार नहीं मानूंगा – एक अटल जीवन गाथा’

वहां मुशर्रफ और वाजपेयी के विशेष सहयोगी शक्ति सिन्हा साथ साथ बैठे थे. शक्ति सिन्हा ने बताया कि वाघा बार्डर पर नवाज शरीफ  वाजपेयी का स्वागत करने पहुंचे थे लेकिन जब उन्हें पता चला कि वाजपेयी के परिवार के लोग, उनकी बेटी नमिता और दामाद रंजन भट्टाचार्य भी उनके साथ हैं तो फिर नवाज़ शरीफ ने अपनी पत्नी को भी बुला लिया.
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लाहौर के उस ऐतिहासिक किले हेलीकॉप्टर उतरा में मुगल शासक शाहजहां पैदा हुए थे और अकबर ने दस से भी ज़्यादा साल गुज़ारे थे. किले के शानदार समारोह और राजकीय भोज में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने ग्यारहवीं सदी के मशहूर शायर मसूद बिन साद बिन सलमान के शेर को याद किया –

शुद दार गम लोहुर खानम यादब।
यारब कि दार आरजू–ए-अनाम यारब।

वाजपेयी ने कहा कि भारत  की खोज  के लिए अमेरिका की तरह कोलम्बस की ज़रुरत नहीं हैं. इससे पहले वाजपेयी गार्ड ऑफ ऑनर का मुआयना कर रहे थे. तब शाम के ढलते सूरज का नज़ारा बेहद खूबसूरत था। तांबई रंग चेहरों को नई लालिमा दे रहा था.

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वाजपेयी बोले,“मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं इक्कीस साल के बाद फिर से अमन और दोस्ती का पैगाम लेकर आपके बीच आ रहा हूं, लेकिन अफसोस इसलिए था कि हमने इतना वक्त रंजिश और कडुवाहट में बिता दिया.” पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने  लाहौर के किले में वाजपेयी के सम्मान भोज में वाजपेयी की कविता  कुछ पंक्तियां उस वक्त पढ़ी

भारत–पाकिस्तान पड़ोसी,साथ–साथ रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना मंहगा सौदा।
रूसी बम होया अमेरिकी,ख़ून एक बहना है।
जो हम पर गुज़री, बच्चों के संग न होने देंगे।                                                                                            जंग न होने देंगें।

लेकिन वाजपेयी नवाज़ से भी आगे बढ़ गये. उन्होंने कहा कि इसके भीतर का एक छंद है कि क्या हमें जंग रोकना है? क्या हमें ऐसे हालात पैदा करने हैं जिनमें जंग न हो. अमन हो, शांति बनी रहे। हथियारों पर खर्च न हो।जितनी जरुरत है, उतना ही हो. उस वक्त वाजपेयी ने लिखा –

हमें चाहिए शांति, ज़िंदगी हमको प्यारी,

हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी,

हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से,

आगे आकर हाथ बंटाएं दुनिया सारी।

हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे,
जंग न होने देंगे।।

तालियों की गड़गड़ाहट इस बात का सबूत थी कि बात सही हो तो दीवारें टूटने लगती हैं. लेकिन असली नेता वह होता है जो सच का सामना करने सा न डरता हो और वाजपेयी तो उससे भी आगे के नेता थे. सवालों से खुद टकराने का हौसला था उनमें.

(Courtesy-‘Har Nahi Manoonga’- a book written by Senior Journalist Vijai Trivedi on Atal Bihari Vajpayee)

(साभार- वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की वाजपेयी की जीवनी ‘हार नहीं मानूंगा – एक अटल जीवन गाथा’. इस पुस्तक का प्रकाशन हार्पर कॉलिन्स ने किया है.)

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