खामोशी से काम करने वाली FARHA NAZEER को उनके इलाके के लोग मदर टेरेसा कहकर क्यों बुलाते हैं?

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Farha Nazeer
Farha Nazeer

जूली जयश्री:

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे करनैल गंज की रहने वाली ‘ Farha Nazeer’ आज अपने नाम के अनुकूल ही लोगों के लिए ‘नजीर’ बनी हुए हैं. निःस्वार्थ सेवा और जन कल्याण के काम में जुटी फरहा को उनके इलाके के लोग मदर टरेसा के नाम से बुलाने लगे हैं.

फरहा को इस छोटी सी उम्र में लोगों का इतना प्यार और सम्मान यूं ही नहीं मिला. वो स्वयं जिन सुविधाओं से वंचित रही आज उसी असुविधा को दूर कर लोगों की जिंदगी में खुशियां भरने को अपना मकसद बना लिया है.

पेंटिंग और लेखन का शौक उसे बचपन से था लेकिन संसाधन की कमी में वो इसकी ट्रेनिंग नहीं ले पायी. लेकिन कहते हैं न जनून हो तो कोई भी परिस्थिति सपनों के आड़े नहीं आती. पढाई के साथ-साथ उसने अपना शौक जिंदा रखा और इंग्लिश में एम ए करते करते वो पेंटिंग और लेखन भी करने लगीं.

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जूली जयश्री

इसके बाद कुछ दिनों के लिए लखनऊ ललित कला अकादमी में भी काम किया. यहां फरहा ने बहुत कुछ सीखने के साथ अपने काम से पहचान भी हासिल किया. अब उसके पास अपने सपनों को खुलकर जीने और पैसा कमाने का भरपूर मौका था लेकिन फरहा ने समाजसेवा करने का फैसला किया.

युवा चित्रकार और लेखिका फरहा अब अपने गांव और आसपास के इलाके के लोगों को मुफ्त में पढाने के साथ ही पेंटिग और राइटिंग स्किल की ट्रेनिंग दे रही हैं. गांव की लड़कियों को सिलाई की ट्रेनिंग भी दे रही हैं.

उनकी संस्था ‘रहनुमा फाउंडेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी’ महिलाओं को सशक्त करने के लिए प्रतिबद्ध है. वो महिलाओं के अंदर छुपे हुनर को व्यवसायिक प्लेटफार्म देने का हरसंभव प्रयास करने में जुटी हैं.

Womenia से बात करते हुए फरहा ने बताया कि जिस कमी को मैंने अपने बचपन में महसूस किया उसे किसी और के जीवन में नहीं आने देना चाहती थी. मुझे लगता है कि मुझे ये नेमत खुदा ने इसलिए ही दी है ताकि मैं जरुरतमंद के लिए कुछ कर सकूं.




करनैल गंज के आसपास के लोगों को फरहा से बहुत सारी उम्मीदें हैं. समाजसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखकर लोग उन्हें मदर टेरेसा कहकर पुकारने लगे हैं. लोगों को उन पर भरोसा है कि फरहा उन्हें अपना व्यवसाय शुरु करने के लिए आर्थिक मदद भी मुहैया कराने में मदद कर सकेगी.

Farha Nazeerहालांकि फरहा को इस बात का मलाल है कि वे अपने यहां काम सीखने वाले कलाकारों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिलवा पा रही हैं. वो कहती हैं कि यदि काम सिखाने के बाद इन महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरु करने के लिए सरकारी फंड भी मिलने लगे तो इनके लिए राह आसान हो जाएगी.




इस होनहार बेटी का समाजिक सरोकार और मानवीय वेदना की गहरी समझ उसकी चित्रकारी में भी झलकती है. समाजिक कुरीतियों, जीवन की विसंगतियों, मानवीय पीड़ा जैसे विषयों को फरहा बेहद संजिंदगी से अपने कैनवास पर उतारती हैं.

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फरहा पेंटिंग के साथ साथ लेखन में भी सक्रिय हैं. उनकी कविताएं अनेक पत्र पत्रिकाओं में छप चुकी हैं. समकालीन कवित्रियों की पुस्तक पर्दे के पीछे में उनकी कविता प्रकाशित हो चुकी है.

Farha Nazeerइस किताब का कवर पेज भी उन्होंने ही डिजाइन किया है. कई किताबों पर उनकी पेंटिंग का कवर पेज छप चुका है.  राज्य कला द्वारा आयोजित पेंटिंग वर्कशॉप और एक्जिविशन में हिस्सा लेकर वो अपनी बेहतरीन चित्रकारी का प्रदर्शन कर चुकी हैं.

फरहा खामोशी से अपना काम करने में यकीन रखती हैं. उन्हें ज्यादा पब्लिसिटी पसंद नहीं है. इसलिए वे अपने कामों का ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं करतीं. लेकिन कहते हैं ना कि काम बोलता है, यही बात फरहा पर लागू होती है. अपने इलाके के लोगों के लिए फराह उनका आदर्श है.

 

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