PORN देखना या पढ़ना यदि ‘पुरुषों’ के लिए ठीक तो ‘स्त्री’ के लिए क्यों है गलत?

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Women watching or reading porn is still taboo for the society

सुमन बाजपेयी:

Porn यानी अश्लील चाहे किताबें हों या फिल्में-जिसमें स्त्री-पुरुषों के सेक्स संबंधों के बारे में खुल कर लिखा गया हो, नग्नता का प्रदर्शन किया गया हो और हर तरह की कामुकता उसमें से झलकती हो उसे देखने या पढ़ने का अधिकार भी केवल पुरुषों के पास ही है. ऐसी स्त्रियां जो Porn पढ़तीं है या देखती हैं वे समाज की नजरों में ‘अच्छी’ नहीं मानी जाती.




सन 1857 में इंग्लैंड के ऑब्सीन पब्लिकेशन एक्ट की रूपरेखा तैयार की गई ताकि गर्भ-निरोधक के प्रचार में प्रकाशित सामग्री को सेंसर किया जा सके.

इसी वर्ष अंग्रेजी भाषा में ‘ Pornography (पोर्नोग्राफी)’ शब्द का प्रवेश ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में किया गया. यानी कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में ऐसी सेक्सुअल इमेजों की भरमार थी जिसे ‘पोर्नोग्राफी’ नाम दिया गया.

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Pik Courtesy: The Straits Times

गूगल ट्रेंड सर्वे’ बताते हैं कि ऐसे 10 शहर जिनमें सर्वाधिक Porn देखा जाता है, उनमें से 7 भारतीय नगर हैं. इसका क्या कारण है कि विश्व भर में सबसे ज्यादा पोर्न फिल्में हमारे देश में देखी जाती हैं.




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जबकि हमारा समाज इनके दर्शक को चरित्रहीन, नैतिक मूल्यों से शून्य व अपराधी मानता है, विशेषकर अगर वह स्त्री हो तो उसे मानसिक रूप से बीमार व नैतिक रूप से गिरी हुई मानता है.




सेक्सुअलिटी पर बात न करे चुप रहें…..

हमारे समाज में स्त्री को केवल मां, बहन, पत्नी या बहू के रूप में पहचान दी जाती है. इन रूपों में ढलने का मतलब है उसका पवित्र होना, उसका आदर्श स्थापित करना. उसका अपना वजूद को दिखाया,  या अपनी सोच या फिर इच्छा जाहिर की खासकर सेक्स से जुड़ी, तो उसे तुरंत चरित्रहीन करार कर दिया जाता है.

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Pik Courtesy: Ogios

पौर्न साइट पर जाकर फिल्में देखना उसेक लिए टैबू है, पर उसके शरीर के साथ पुरुष कैसा भी खिलवाड़ क्यों न कर ले या उसे सबके सामने उघाड़कर ही क्यों न रखे दे…वह सब उसके अधिकार क्षेत्र व पौरुष की निशानी है.

स्त्री अपने पति को भी यह बात नहीं बता सकती कि उसे पोर्नोग्राफी में दिलचस्पी है और वह भी उसका आनंद उठाना चाहती है. असल में माना यही गया है कि प्लेजर सिर्फ पुरुषों के लिए है.

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सुमन बाजपेयी

उसे खुद को स्टीमुलेट करने और स्त्री को सुख देने के लिए पोर्न का सहारा लेने की आवश्यकता पड़ती है. स्त्री यदि देख या पढ़ ले तो माना जाएगा कि वह अपनी इच्छाओं का प्रदर्शन कर रही है, जिसकी उसे अनुमति नहीं है.

पोर्न सामग्रियों से बाज़ार अटा पड़ा है. दुकानदार फुसफुसाते हुए 150-200 रुपये में आपका 2 GB कार्ड ‘फुल’ कर देते हैं. ‘ब्लू फिल्में’ आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं और गूगल ऐसी साइटों से भरा हुआ है, पर स्त्री न तो बाजार जाकर उन फिल्मों के वीडियो खरीद सकती है और न ही ऐसा साहित्य.

जब सैनेटरी पैड और ब्रा खरीदते हुए वह अपनी आवाज इतना धीमा रखती है कि दूसरे न सुन ले और उसे काली थैली में छिपाकर घर लाती है तो ऐसे में पोर्न फिल्में देखना या साहित्य पढ़ना तो उसके लिए किसी अपराध से कम नहीं. इस पर टैबू होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

आज की एजुकेटेड, टैलेंटेड और इंडीपेंडेंट वूमेन के लिए पोर्न कब अश्लील और गंदे के दायरे से बाहर आएगा यह उसे ही तय करना होगा. तभी वह अपनी सेक्सुअलिटी को भी एक्सेप्ट कर पाएगी.

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