इंदौर में ‘WOMEN ON WHEELS’ , ‘ऑन कॉल’ हाजिर और सुरक्षित घर पहुंचाने में माहिर

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Women On Wheels-आइए मिलते हैं  इंदौर की उन महिलाओं से जो ड्राइविंग के पेशे में आई हैं और रोज नई चुनौतियों का डट का सामना कर रही हैं.

1- कृष्णा सोलंकी-

इंदौर की प्रसिद्ध होटल अमरविलास में Driver के तौर पर काम किया. अभी वे निजी ड्राइवर के तौर पर नौकरी कर रही हैं.

2-शोभा विश्वकर्मा-

नियोकॉर्प प्राइवेट लि. में ड्राइवर की नौकरी करते हुए कई तरह की गाड़ियां चलाने का अनुभव हासिल कर चुकी हैं.

3-ललिता उजले-

समान संस्था की पहली महिला ड्राइविंग फैकल्टी होने का गौरव हासिल किया है.




4-जयश्री तायड़े-

मारुति ड्राइविंग स्कूल में कार ड्राइवर ट्रेनर

5-रंजीता लोधी-

इंदौर शहर की पहली ‘ड्राइवर ऑन कॉल’ का गौरव हासिल.

6-प्रिया अठवाल-

इंदौर की प्रतिष्ठित होटल मेरियट में ड्राइवर

7-प्रभावती यादव-

कई महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग दे चुकी है.

इस फेहरिस्त में अभी और भी कई नाम हैं. आत्मविश्वास और जोश से भरी ये महिलाएं ड्राइवर हैं और इंदौर की सड़कों पर फर्राटे से अपनी गाड़ियां भगा रही हैं.

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करीब 100 Female Drivers बच्चों, महिलाएं, सीनियर सिटीजन या परिवार के किसी भी सदस्य को सुरक्षित घर पहुंचा रही हैं. महिलाओं को ऑफिस और बच्चों को कोचिंग क्लासेस भी छोड़ रही हैं. यह महिला ड्राइवर मासिक वेतन पर भी उपलब्ध है. वहीं ऑन कॉल प्रतिदिन के चार्जेज पर भी आ सकती हैं.




वुमनिया से बातचीत में प्रिया अठवाल बताती हैं डाइविंग करते हुए 5 महीने हो चुके हैं. अच्छा लग रहा है. मेरिएट होटल में करती हूं.  मैं  अक्सर पायलट, एयर होस्टेस और सेलेबेरिटीज को एयरपोर्ट से होटल लाती हूं. वे जब देखते हैं तो कहते हैं ड्राइविंग सीट पर एक फीमेल को देखकर अच्छा एक्सपिरियंस हो रहा है.

वे बताती हैं कि उन्हें 10-11 घंटे काम करना पड़ता है. कभी-कभी होटल में या सड़का पर बुरा व्यवहार भी होता है. लड़कियों के साथ जिस तरह की घटनाएं बढ रही हैं उससे लगता है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को इस फील्ड में आना चाहिए.

रात में कभी-कभी खुद के लिए बहुत डर लगता है पर संस्था ने हमें सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग भी दी है. इसलिए मैं किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हूं. प्रिया अपनी नौकरी के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रही हैं. अभी शादी नहीं हुई है.  लेकिन उन्हें जीवनसाथी ऐसा चाहिए जो  पढा-लिखा होने के साथ-साथ उसके काम की भी कद्र कर सके. होना चाहिए.

वंचित और ग़रीब तबके की ये महिलाएं पहले दूसरों के घरों में झाडू़ पोंछा लगाने का काम करती थीं. लेकिन नए काम ने उनमें बहुत आत्मविश्वास भर दिया है.  इन महिलाओं का कहना है कि पहले उन्हें लगता था कि उनका कोई वजूद ही नहीं है.

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ललिता उजले अभी संस्था के 15 लड़कियों को ड्राइविंग की ट्रेनिंग दे रही हैं. ट्रेनिंग लेने वाली वो महिलाएं हैं जो टैेक्सी चलाना चाहती हैं. ललिता बताती हैं कि मुझे अपना काम बहुत पसंद है.

मैं शुरु से चाहती थी कि मैं सबसे अलग हट कर कुछ करुं. डाइविंग करना बहुत पसंद आता है. शादीशुदा हूं और दो बच्चे हैं.  मेरे काम से पति को तो कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मेरी मां को यह काम पसंद नहीं है. उनके मन में एक डर बना रहता है.




इन महिलाओं को ड्राइविंग का प्रशिक्षण समान सोसाइटी और आजाद फाउंडेशन ने मुहैया कराई है. समान संस्था के फाउंडर राजेंद्र बंधु जो कि सरोकार की पत्रकारिता और अपने सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते हैं वे बताते हैं कि मैंने टीवी कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ में देखा कि आजाद फाउंडेशन महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग देता है.

राजेंद्र बंधु

वे बताते हैं कि कार्यक्रम देखने के बाद मैंने सोचा कि इंदौर में भी ऐसा काम किया जा सकता है. महिलाओं को आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर बनान के लिए यह अनूठा अभियान चलाया गया है जिसका नाम है ‘Women On Wheels’ जिसमें महिलाओं ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया है.

इस अभियान के तहत महिलाओं को ड्राइविंग का प्रशिक्षण दिया गया. अब ये महिलाएं एक प्रोफेशनल ड्राइवर की तरह सेवाएं दे रही हैं. कई महिलाएं नगर निगम में, तो कोई होटल में तो कोई निजी तौर पर अपनी सेवा दे रही हैं. कई महिलाओं ने तो अब बकायदा बैंक से लोन ले कर अपनी टैक्सी चलाना शुरु किया है.

 

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