सोशल मीडिया- VIRTUAL WORLD क्यों असली लगने लगता है बच्चों को?

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Virtual World
why do the virtual world seem to be real to children?

प्रियंवदा सहाय:

सोशल मीडिया का Virtual World जिसमें ख़ुद को सुंदर, साहसी, चतुर और दूसरों से बेहतर होने का एहसास होता है वो टीएनएजर्स के दिलोदिमाग़ पर अपनी गहरी छाप छोड़ रही है.

जानकारियों का भंडार, सभी जिज्ञासाओं का जवाब उनकी ख़ुद की सोच को सीमित और नियंत्रित करने का काम कर रही है टीन एजर्स के लिए सोशल मीडिया उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. यह काफ़ी हद तक उनके जीवन को प्रभावित कर रहा है.




कई दफ़ा सोशल मीडिया के उकसावे में आकर वे ऐसे कारनामों को अंजाम दे देते हैं जो उनके लिए क़तई नहीं करना चाहिए. जानकार मानते हैं कि जिस उम्र में उन्हें ख़ुद की सोच व निर्णय स्थापित करने चाहिए उस उम्र में किशोरों की सोच का दायरा सोशल मीडिया के हिसाब से ढल रहा होता है.

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सोशल मीडिया संकुचित और ख़ुद के अनुरूप इस तरह ढालता है कि वे  घर के बड़े-बुजुर्गों के अनुभव, उनकी हिदायतें, परामर्श और सलाह के लिए समय देने के बजाए फैक्ट्स को जाने बिना लोगों के Tweets, कमेंट्स, अनुभव और उनकी जानकारी के आधार पर अपनी राय बनाने लगे हैं.


टीन एजर्स को साइबर धमकी और नापसंद ट्वीट कमेंट या संदेश डिप्रेशन में डाल रहे हैं. उनके फोटो पर लोगों के ज्यादा कमेंट नहीं मिले तों वे खुद को कमतर  मानने लगते हैं.

सार्वजनिक मंच पर उन्हें परेशान करने वाले संदेश और लोगों की प्रतिक्रिया किशोरों की मानसिक बीमारी का कारण बनती जा रही है. सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव की वजह से आए दिन बच्चे अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं या फिर उनकी सनक मौत के दरवाज़े तक ले जा रही है.

Pic Courtesy: shutterstock




मनोचिकित्सक प्रतिष्ठा त्रिवेदी कहती हैं कि हाल के दिनों में सोशल मीडिया के कारण डिप्रेशन जैसी नई चुनौतियां सामने आने लगी है. बच्चों पर साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया के कमेंट्स व लाइक्स काफ़ी हद तक प्रभाव डाल रहे हैं.

इस मंच के कारण कई दफ़ा बच्चों पर अनावश्यक दबाव बनता है ताकि वे दूसरों को दिखाने या बराबरी करने के लिए कुछ नया अलग करें. ऐसी चीज़ों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करें जिनसे आभासी दुनिया में वाहवाही मिल सके.

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ऐसा सिर्फ बच्चों के साथ नहीं बड़ों के साथ भी हो रहा है. प्रतिष्ठा त्रिवेदी कहती हैं बच्चे वास्तविक और आभासी दुनिया का अंतर करना भूल जाते हैं जो उनके लिए गंभीर परिणाम भी ला सकता है. इसलिए अगर आपके बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं तो उन पर नजर रखना पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी बनती है.

हालांकि सोशल मीडिया के सकारात्मक पहलू भी हैं. यह अकेली दूसरों से अलग-थलग पर चुके रिश्तों को संजोने का काम भी कर रही हैं. बच्चे अपने परिवार, दोस्त और जानने वालों के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं.

यह उनके साथ अपने संबंध प्रगाढ़ करने का ज़रिया भी बन जाता है. इस मंच के ज़रिये दुनिया भर की जानकारी और कुछ नया जानने की ललक को शांत करता है.

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