BHOOMI क्यों मानती हैं कि लड़कियां अब लड़कों से पूछेगी तुम्हारे घर में TOILET है?

1996
Bhoomi Pednekar
Bhoomi Pednekar

अपनी पहली फिल्म ‘दम लगा के हइशा’ में Bhoomi Pednekar ने कैरेक्टर की स्वाभाविकता बनाए रखने के लिए अपना शरीर भारी-भरकम बना लिया. उनके दमदार अभिनय की वजह से फिल्म को बहुत सराहना मिली. अब भूमि अपनी अगली फिल्म ‘Toliet-Ek Prem Katha’ के जरिए फिर से पर्दे पर आ रही हैं. इस फिल्म में जो संदेश है और इसकी जो कहानी है उसको भूमि बचपन में तब महसूस किया था जब वे स्कूल जाया करती थीं. वे मुंबई में पली-बढ़ीं और सुबह स्कूल जाते समय लोगों को पटरियों के पास या सड़क किनारे खुले में शौच जाते देखा करती थीं. तब सोचती थीं कि लोग गरीबी में ऐसा करते हैं या मूलभूत सुविधाओं के एहसास में….’टॉयलेट एक प्रेम कथा’ फिल्म करते समय उनके क्या अनुभव रहे और इस सामाजिक बुराई के बारे में वे क्या सोचती हैं इस पर उन्होंने विस्तार से बात की वुमनिया संवाददाता रुना आशीष से…..




सवाल-समाज को खास संदेश देती इस फिल्म को करने का अनुभव कैसा रहा?

भूमि- शौचालय बनवाने के मामले में गावों में बहुत बुरा हालत है. लोग शौचालय बनवाते ही नहीं हैं. घर में सबकुछ होगा, पूरी संपन्नता होगी लेकिन शौचालय नहीं होगा. लोग सोचते हैं जिस आंगन में तुलसी हो वहां शौचालय कैसे बनवाएं. हम तो अपनी फिल्म के जरिए लोगों की इसी सोच पर प्रहार करना चाहते हैं. सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि हर घर में शौचालय हो. हमने देखा कि गांवों में सरकार ने अगर टॉयलेट बना भी दिए हैं तो वहां पर लोगों ने गोदाम बना लिए हैं या फिर दुकानें चला रहे हैं. यूएन का कहना है कि हमारे देश में 50 प्रतिशत बलात्कार के केस तब होते हैं जब महिलाएं शौच करने घर के बाहर अंधेरे में निकलती है. वो सूरज उगने के पहले 4-4.30 के समय पर जाती हैं और सूरज ढलने के बाद बाहर जा सकती हैं. इस बीच उसे खुद पर कंट्रोल करना पड़ता है. हम तो थोड़ी देर भी कंट्रोल नहीं कर पाते. सोचिए ऐसी स्थिति में महिलाएं कैसे रहती होंगी.

सवाल-आपके लिए फिल्म का सबसे मुश्किल सीन कौन सा था?

भूमि- जब मुझे टॉयलेट के सीन फिल्माने थे. मेरे लिए बहुत मुश्किल था कि मैं अपने कपड़े उठाऊं और बस बैठ जाऊं. अब सोचिए महिलाएं कैसे करती होंगी ये सब?




RELATED TO THIS: ‘WIFE चाहिए पास तो क्यों चाहिए संडास’

 

सवाल-टॉयलेट एक प्रेम कथा-फिल्म क्या संदेश देती है?

भूमि- फिल्म का जो सबसे बड़ा संदेश यही है कि एक तरफ आप महिलाओं को घर की इज्जत मानते हो, उसे घूंघट में रखते हो और दूसरी तरफ उसे शौच के लिए खुले में भेज देते हो. ये तो Double Standard है.

सवाल-आप किस तरह के रोल चुन रही हैं?

भूमि- मैं जितनी भी फिल्में कर रही हूं सभी क़िरदार बहुत ही मज़बूत इरादों वाली हैं. सभी लड़कियां अपने हक़ के लिए खड़ी होने वाली लड़कियां हैं. मुझे ऐसे ही रोल पसंद आते हैं. मेरे हिसाब से लड़कियां पैदाइशी मज़बूत इरादों वाली होती हैं खासकर भारतीय महिलाएं जिन्हें सालों से दबाया जाता रहा है. महिला सुरक्षा की बात करें तो स्थिति भयावह है. अगर मुंबई में पब्लिक ट्रांसपोर्ट से भी जाऊं तो मैं बचते-बचाते खड़ी होती हूं क्योकि हमने सालों से एक तरीके से ही ल़ड़कियों को पलते बढ़ते देखा है. लेकिन अगर मौका पड़े तो हम मार भी सकती हैं.




सवाल-आपको लगता है कि यह फिल्म लोगों को प्रेरित करेंगी?

भूमि- हमारी तो फिल्म ही अनीता से प्रेरित है. उसने बहुत बड़ा कदम उठाया था. वो जिस तरह के घर से ताल्लुक रखती हो सकता है उनके घरवालों ने पैसे उधार ले कर उसकी शादी की हो लेकिन अनीता नो अपने सम्मान और अपने हक़ के लड़ाई के लिए आवाज उठाई. अब तो ऐसी कई कहानियां सुनने में आ रही है कि शौचालय नहीं हे के कारण लड़की ने शादी करने से मना कर दिया. हमें आशा है कि हमारी फिल्म ऐसी कई लड़कियों को प्रेरणा दे कि वो शादी के बात करते समय ही पूछ ले कि क्या आपके घर में टॉयलेट है?