जब-जब निर्भया की मां का इंटरव्यू टीवी पर आता निर्भया के RAPIST क्या कहते थे?

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Rapist
whenever nirbhaya's rapist saw nirbhay's mother on tv, what did they say

रीवा सिंह:

आज निर्भया के रेप और मर्डर के दोषी तीनों Rapist के Review Petition का सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने के बाद मुझे  यह बात फिर से याद आ गई. निर्भया के Rapist में कोई पछतावा नहीं था. बड़ी से बड़ी ग़लती के बाद भी इंसान को बाद में थोड़ा पछतावा तो होता है पर यहां उसका लेशमात्र भी नहीं था. उल्टा क्रोध भरा हुआ था.




मैं सुनेत्रा चौधरी की किताब ‘बिहाइंड बार्स’ (Behind Bars) पढ़ रही थी. किताब ख़त्म होने को थी, आख़िरी अध्याय कोबाड गांधी की जेल यात्रा से संबंधित था. वो अपना अनुभव बता रहे थे.

70 वर्ष की उम्र में जेल-यातना का अनुभव, उनकी सेहत को लेकर लगातार की जा रही उनकी अपील और जेल के दूसरे क़ैदियों का व्यवहार. यह सब सुनाते हुए उन्होंने यह भी बताया कि उनके बगल वाले वॉर्ड में निर्भया के Rapist क़ैद थे.




जब टीवी पर निर्भया की मां का इंटरव्यू आता तो वे Rapist चिढ़ जाते और कहते- इसका भी बलात्कार होना चाहिए. मैंने यह पढ़ा और फिर यह पांच बार पढ़ा.

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दूसरी बार यह निश्चित करने के लिए कि कहीं मैंने कुछ ग़लत तो नहीं पढ़ लिया. बाकी तीन बार मैं अचंभित होकर पढ़ती रही. यकीन नहीं हो रहा था कि मैं ये पढ़ रही हूं. उन्हें अपने किये पर न पछतावा था और न अफ़सोस.




क़ैद में होने के बावजूद उनके दिमाग में यही बात आयी कि चूंकि लड़की की मां उनका विरोध कर रही है, मां का भी बलात्कार होना चाहिए.

इसके बाद मैं कुछ देर तक ठहर गयी और सोचने लगी कि क्या बदल गया क़ैद करने से? हम जिसे सज़ा मानकर बैठे हैं वह असल में इनके लिए सज़ा है ही नहीं. काउंसलिंग से इनका क्या भला होगा जो इतने महीनों बाद, पूरे होश-ओ-हवास में होकर भी अपनी कारस्तानी का परिणाम देखकर भी यही सोच रहे हैं कि मां का भी बलात्कार होना चाहिए.

इन्हें जनसैलाब का भय नहीं, ये कोर्ट के तमाम फैसलों से नहीं डरते, समाज में इन्हें सिर छिपाने की जगह नहीं मिलेगी इसकी चिंता भी नहीं है, कैसे इंसान हैं ये लोग. बड़ी से बड़ी ग़लती के बाद भी इंसान को बाद में थोड़ा पछतावा तो होता है पर यहां उसका लेशमात्र भी नहीं था. उल्टा क्रोध भरा हुआ था.

उस लड़की को ये जानते ही नहीं थे, कोई दुश्मनी, कोई प्रतिशोध वाली घटना नहीं थी वह. उस लड़की का न सिर्फ़ बलात्कार हुआ बल्कि उसकी योनि में रॉड और बोतलें ठूंस दी गयीं.

बेगुनाह इंसान के साथ ऐसा व्यवहार किया और रत्तीभर भी पछतावा नहीं. और पछतावा न हो तो भी एक मौन एहसास हो सकता था पर वो भी नहीं. इन्हें अभी और बलात्कार करने हैं.

पहले उसकी मां का फिर उन तमाम स्त्रियों का जो इनके बलात्कार का विरोध करती रहीं. इनमें से ही एक, विनय शर्मा ने आत्महत्या की कोशिश की थी और हम में से कई ने यह मान लिया था कि वह उसका पछतावा था.

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कोबाड कहते हैं कि जेल में विनय के साथ बलात्कार हुआ इसलिए वह अवसाद में था, इस अवसाद के कारण वह ख़ुदकुशी करना चाहता था. मतलब उसे अपनी मर्दानगी के साथ हुई नाइंसाफ़ी का क्षोभ था.

मुझे जब-तब लगता है कि यदि ऐसे दरिंदों को फांसी की सज़ा होने लगी तो वह बच्चियों और महिलाओं को बलात्कार कर के नहीं छोड़ेंगे बल्कि उन्हें मार डालेंगे. मंदसौर के भी दोनों बलात्कारियों ने मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी क्योंकि फांसी किसी को नहीं चाहिए.

आज मुझे लग रहा है कि ये तो उनकी अपनी इच्छा है जिससे हम बाधित हो रहे हैं और हमें बाधित नहीं होना है.नाबालिग बच्चियों से बलात्कार के जुर्म में सज़ा को यदि फांसी से घटाकर उम्रक़ैद कर दिया जाए तो भी कोई बलात्कारी किसी लड़की का बलात्कार कर के ज़िंदा छोड़ेगा इसकी क्या गारंटी है?

कोई मामूली चोर भी अगर चोरी करता है तो वह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी चोरी पकड़ी न जाए भले उसे उसके लिए तीन से पांच वर्ष की ही सज़ा होनी हो, फिर कोई बलात्कारी किसी लड़की का बलात्कार कर के यह सोचकर क्यों छोड़ देगा कि उम्रक़ैद ही तो है, फांसी तो नहीं है.

हमें यह मान लेना चाहिए कि हम बहुत ख़तरनाक युग में जी रहे हैं, अब मुझे सेक्स एजुकेशन भी स्थिति सुधारने का उपाय नज़र नहीं आता. सेक्स एजुकेशन से स्थिति सुधरती तो पढ़े-लिखे तबकों में बलात्कार नहीं होते, एलीट क्लास और शिक्षित परिवारों की लड़कियां बेख़ौफ़ जीतीं लेकिन ऐसा नहीं है.

लड़कियां अपने रिश्तेदार, पड़ोसी, क्लाइंट, बॉस और जो भी संभव हो उसके द्वारा रेप की जाती हैं. सभी को अफ़सोस होता है या नहीं यह जानने के लिए कोई पैमाना नहीं है. पुरातन काल को मिथक भी मानें तो आज भी आपको उदाहरणों की कमी नहीं होगी जो यह साबित करें कि औरत जहां तक हो सके भोग्या बनायी जाती है.

हमारी बच्चियां मारी जाएंगी यह सोचकर हमें उन्हें जीवन दान देने की लड़ाई बंद कर देनी चाहिए. बच्चियां अब भी मारी जा रही हैं और 12 वर्ष की उम्र से कम की बच्ची के बलात्कारी को फांसी देने की जो सज़ा पारित हुई है उससे पहले भी मारी जा रही थीं.

आज हम उनकी फांसी रोकेंगे तो कल वो जेल भी नहीं जाना चाहेंगे, इतने पर भी मार डालेंगे. फिर हम क्या करेंगे? डरते-डरते जाएंगे कहां? बच्चियां और महिलाएं अब भी बहुत ख़तरे में हैं, आज से ख़तरा बिल्कुल न बढ़े और यहीं रुक जाए तो भी यह स्टैंडर्ड कम नहीं है स्त्री-जीवन को कुचल डालने के लिए.

वो जेल में जाकर भी समझते हैं अधिपत्य स्थापित कर लिया, ऐलान कर रहे हैं कि इसका भी बलात्कार होना चाहिए. हमें बाहर बैठकर यह मान लेना है कि इन्हें फांसी होनी चाहिए, बस. जब इन्हें बचाने से भी हम नहीं बच रहे तो इन्हें इनके हिस्से की सज़ा से ही नवाज़ा जाए.

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