SARVESH TAI- घरेलू हिंसा से फोटोग्राफी तक के सफर के बाद कैसे बनाया ‘परफेक्ट फ्रेम’

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Sarvesh Tai
Sarvesh Tai well known photograoher written a book-perfect frame

प्रतिभा ज्योति:

मीडिया में भला Sarvesh Tai को कौन नहीं जानता? कैमरा लेकर दुनिया नापने वाली इस महिला फोटोग्राफर की जिजीविषा और संघर्ष का अंदाजा हम आप आसानी से लगा ही नहीं सकते. रोज-रोज की घरेलू हिंसा से मुक्ति पाने के बाद फोटोग्राफी जिसे पुरुषों का क्षेत्र माना जाता रहा उसमें सेंध लगाकर मीडिया में अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए सर्वेश जैसा संघर्ष करने का माद्दा हर किसी में नहीं होता.




फोटोग्राफर, धावक, समाजसेविका बनने के बाद सर्वेश के खाते में अब एक और उपलब्धि है. वे लेखन में भी उतर आई हैं. अपने ही समान दूसरी महिला फोटोग्राफरों को जीवन और करियर में किन झंझावतों और मुश्किलों का सामना करना पड़ा है इसी को बताने के लिए उन्होंने ‘परफ्केट फ्रेम’ नाम की एक किताब लिखी है.

यह किताब 33 महिला फोटोग्राफर और वीडियो फोटोग्राफर की सच्ची कहानियों का एक संकलन है. सर्वेश कहती हैं कि मीडिया में कई-कई घंटों तक काम करने के बाद भी महिला फोटोग्राफर और वीडियोग्राफरों को वह अवसर और पदोन्नति नहीं मिलती जो एक पुरुष को मिलता है. यह किताब महिला फोटोग्राफरों के अपने अनुभव बताते हैं.




‘घरेलू हिंसा से फोटोग्राफी तक’ कैसा रहा सफर?

भारतीय महिलाएं अक्सर घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. सर्वेश भी इससे अछूती नहीं रही. पति के रोज-रोज की मार और तानों ने उन्हें मानों यह स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया था कि पति की हर बात को बिना कुछ कहे मानना उनका कर्तव्य है.

वे जिस घर में ब्याही गई थीं वहां की स्त्रियों को बचपन से यह बात घुट्टी की तरह पिलाई गई थी कि पति यदि पीटता हो तो यह कोई ग़लत बात नहीं है. औरतों को पति से हमेशा दब कर रहना चाहिए और ससुराल से उनकी अर्थी ही निकलनी चाहिए.

मूल रुप से हरियाणा की रहने वाली सर्वेश की शादी 1975 में हो गई. उस समय वे 11वीं में पढ़ती थीं. तरुणाई में वे शादी-ब्याह की गंभीर बातों को नहीं समझती थीं लेकिन मन में नए जीवन को लेकर एक उल्लास जरुर था. मगर यह उल्लास उस समय दुख और तनाव में बदल गया जब पति बात-बात पर मारपीट पर उतारु होने लगा.




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सर्वेश बताती हैं कि-घर का माहौल ऐसा था हम महिलाएं घुट कर जीतीं थीं. हम किसी बात पर बोलने या अपनी राय रखने या विरोध जताने का हक़ नहीं था. मुझसे मारपीट की भाषा में ही बात की जाती. घरेलू हिंसा और शादी में मिल रही इस प्रताड़ना को मैंने क़रीब 10 साल झेला.

इस दौरान उन्होंने साड़ी में फॉल लगाने का काम शुरु कर दिया. वे बताती हैं कि साड़ी में फॉल लगाने पर मुझे पांच रुपए मिलते और मुझे खुशी मिलती लेकिन इसके बाद प्रताड़ना और शुरु हो गया.

आस पड़ोस की महिलाएं मेरे चोट देखतीं तो सवाल करतीं. एक दिन जब मुझे बुरी तरह पीटा गया तो मेरी एक सहेली ने मेरे अंदर के स्वाभिमान को जगाते हुए कहा-कब तक यह मार सहोगी? 1988 में मैंने अपने पति का घर छोड़ने का फैसला कर लिया और शेल्टर होन की शरण ली.

पति परमेश्वर नहीं होता, हम औरतें ही देती हैं पुरुषों को ज्यादती करने की छूट

मैने पति के खिलाफ थाने में शिकायत कर दी और इस घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि पति परमेश्वर नहीं होता और हम औरतें ही ज्यादतियों को बर्दाश्त कर इन मर्दों को हमें दबाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं.

पति का घर छोड़ने के बाद सर्वेश के सामने दूसरी चुनौतियां खड़ी हो गईं. वे ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली. धीरे-धीरे वे ब्यूटीशियन का काम करने लगीं और थोड़े-बहुत पैसे कमाने लगी और तलाक का केस भी लड़ने लगीं.  1990 में उन्हें तलाक़ मिला और इसी दौरान उनके एक मित्र ने उन्हें कैमरा गिफ्ट किया.

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सर्वेश आज भी उस दिन को याद करके बताती हैं पता नहीं मेरे उस दोस्त ने क्या सोच कर मुझे कैमरा दिया था. मानो भगवान ने मेरे लिए कुछ और तय कर रखा था. वही कैमरा मुझे मंजिल तक ले आया. जिस दिन मुझे कैमरा मिला था मैंने सबसे पहले अपने बाल कटवा लिए थे.

हालांकि कैमरे को लेकर फोटोग्राफी करने का सफर कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा और उनके सामने कई चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी थीं. जिस समय सर्वेश फोटोग्राफी में आई मीडिया में पुरुष फोटोग्राफरों का वर्चस्व था और तकनीकी रुप से फोटोग्राफी आसान भी नहीं थी.

फोटोग्राफी ने दी जीने की वजह

उनके सामने सबसे पहले चुनौती थी फोटोग्राफी सिखने की. बकौल सर्वेश-मैने इस चुनौती को खुलकर स्वीकार किया और जुनून से फोटोग्राफी सीखी. मुझे लगने लगा था कि फोटोग्राफी मुझे जीने की वजह दे सकता है इसलिए इसके रास्ते में आने वाली कई परेशानियों का सामना किया.

सबसे पहले पैस का संकट था. कई दिनों तक भूखे रहना पड़ा. उन्होंने कई दिनों तक लंगर में खाना खाया. फोटोग्राफी का पहला काम देहरादून से शुरु हुआ. 1991 में पहली बार नवभारत टाइम्स में उनका खींचा एक फोटो छपा और वे अपना नाम देखकर इस कदर खुश हुईं कि अपने आंसू नहीं रोक पाई.

हालांकि मीडिया में काम के दौरान उनके सामने बड़ी मुश्किल आ रही थी. उनके साथ के कई पुरुष फोटोग्राफर और लोग उन पर ताने कसते थे. वे बताती हैं लोगों को जैसे ही मेरी निजी जिंदगी के बारे में थोड़ा सा भी कुछ पता चलता वे मुझ पर कई तरह की फब्तियां कसते लेकिन मैंने संघर्ष जारी रखा. कई महिला साथियों ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया और मुझे काम देने लगे.

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इसके बाद तो मानो सिलसिला चल पड़ा और सर्वेश मीडिया में एक ऐसे फोटोग्राफर के तौर पर स्थापित होने लगीं जिनके काम और जज्बे की सराहना होने लगी थी. उन्होंने पहली बार अपने फोटो का एक एग्जिबिशन दिल्ली में लगाया और इसके जरिए उन्हें और पहचान मिली.

अपने फोटोग्राफी के करियर के दौरान सर्वेश को नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान टाइम्स, आउटलुक, इंडिया टुडे और जनसत्ता के साथ काम कर चुकी हैं. इस दौरान उन्होंने जीवन के कई रंगों की तस्वीरें अपने कैमरे से उतारी हैं.

सर्वेश ऐसी महिला फोटोग्राफर हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध की फोटो लेकर दुनिया को युद्ध की त्रासदी दिखाई. उत्तरकाशी भूकंप या बुंदेलखंड का सूखा इन सब आपदाओं में हुए भयंकर विनाश को भी उन्होंने अपने कैमरे से देखा है.

जिस उम्र में लोग आराम करते हैं वे ट्रैक पर दौड़ रहीं  

उनके व्यक्तित्व के कई आयाम हैं. जिस उम्र में लोग थक कर आराम करने की सोचने लगते हैं उस उम्र में सर्वेश ने दौड़ना शुरु कर दिया. जी हां वे 2015 से सिनियर सिटीजन रेस में हिस्सा ले रही हैं. अपनी मेहनत की बदौलत 3 साल में उन्होंने 15 मेडल जीत लिए हैं.

वे एक पर्तवारोही भी हैं और देश के कई पर्वतों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की है. अपनी इन अनगितन उपलब्धियों के लिए सर्वेश कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं. उनके संघर्ष और सफलता को लेकर कई टीवी चैनलों ने उन पर कार्यक्रम बनाए हैं. वे समाज सेवा के काम से भी जुड़ी हैं. फोटोग्राफी पर कई वर्कशॉप में बच्चों को फोटोग्राफी के ट्रनिंग भी देती हैं.

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