हम यूं ही नहीं मानते कि स्त्री अस्मिता की आवाज़ हैं GEETASHREE

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Geetashree

सोनिया बहुखंडी:

कवयित्री:

कल ही नया ज्ञानोदय का स्त्री स्वर का उत्सव अंक मेरे हाथ मे आया, Geetashree की कहानी ” आई वाज रेपेड ट्वाइस” पढ़ी तो साहसी स्त्रियों की मुहिम याद आई. स्त्री विमर्श में गीताश्री का नाम किसी भी परिचय का मोहताज नही है.

उनकी कहानी में बलात्कार के बाद की पीड़ा, घुटन, और बेबसी को दर्शाया गया है. बलात्कार मात्र शरीर का नही होता एक आत्मा का भी होता है और पीड़ित पर इस पीड़ा का आनंद उठाने का आरोप लगाया जाए तो सोचिए आरोपी भी कितना बड़ा रेपिस्ट है?




एक लड़की जो रेप के बाद अपने एकांत से लड़ रही है, एक प्रकाशस्तंभ की तरह किसी की प्रतीक्षा में मानो कोई उसे इस मर्म से मुक्त कराएगा. छोटे-छोटे तमाम अर्जियों से उसके बन्द कमरे की दीवारें पटी पड़ी हैं, जो लिखी गई थी समाज के नाम, अपने अभिभावक के नाम और एक कायर प्रेमी के नाम भी. ये छोटे पत्र जो तीन माह से अपने पते पर नही पहुंचे शायद वो भी गुजर रहे थे एक पीड़ा से जो पीड़ित को आज तक न इंसाफ दिला पाए ना दर्द से मुक्ति. मात्र पुर्जे हैं जो दर्द से फड़फड़ा रहे हैं एकांत की दीवार पर.




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सोनिया बहुखंडी ,कवयित्री

शाल्वी जो विक्टिम है जीने की चाह में है जिसकी चाह को आशा की किरण दिखाती है एक अंग्रेज युवती रेचल, जिसे साल्वी के प्रेमी आशीष ने भेजा है, वही प्रेमी जिसने शाल्वी पर आरोप लगाया कि उसने बलात्कार होने दिया. वह चाहती तो ये सब रुक सकता था वह परिस्तिथियों से लड़ सकती थी लेकिन वह भी रेप का आनंद उठा रही थी. कितना आसान होता है यह कहना कि रेप एक आनंद की दशा है.

रेप होने दिया गया या फिर लड़की की इज़्ज़त लुट गई अब उसका भविष्य नही सबकुछ पहले जैसा सामान्य नही हो पाएगा. कहीं मुंह दिखाने लायक नही रह गई लड़की. जबकि एक घायल आत्मा दर्द से चीख रही होती है.  ज़ख्म हमेशा के लिए खुले रह जाते हैं. जब भी उस विषय मे चर्चा होती है दर्द की तेज लहर उठती है. इसको वे लोग  कतई नही समझ सकते जो इज़्ज़त के लिए विलाप कर रहे होते हैं.




हाल ही में प्रकाशित मनोविज्ञान के एक अध्ययन के अनुसार पिछले तीस सालों में की लगभग 20 शोधों से यह पता चला है कि पचास से अधिक प्रतिशत में स्त्रियां बलात्कार की वासना रखती हैं, चाह रखती हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक तो यह तक कहते हैं कि कई बार स्त्री स्वयं ऐसी परिस्थितियां पैदा करती हैं कि उसका बलात्कार हो जाए.

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स्त्री की गहन चाह कि कोई पुरुष उसका पागल हो जाए, कि वह इतनी सुंदर है कि किसी को भी पागल कर दे, कि वह इतनी बड़ी जरूरत है कि कोई उसके लिए जान की बाजी लगा दे, बलात्कार के मूल होती है. यह तो एक मनोवैज्ञानिक सोच है बलात्कार के पीछे, लेकिन सबसे बड़ा सच यह भी की यदि किसी चीज के लिए न कि अभिव्यक्ति है तो उसका सीधा मतलब ना ही होता है.
यही बात शाल्वी के केस में भी थी. हां ये बात और है उसके जीवन की चाह ने बलात्कार होने दिया ताकि अगले दिन वह अपराधी को इसकी सजा दिलवा सके. उसकी इसी चाह के कारण आशीष ने उस पर रेप का आनंद उठाने का आरोप लगाया। और उसे उसके दर्द के साथ अकेला छोड़ अमेरिका चला गया.

 

बाद में जब आशीष को अपने किए पर पछतावा हुआ तो उसने अपने मित्र रेचल के जरिए क्षमापत्र के साथ शादी का प्रस्ताव भी भेजा. सम्भवतः कोई अन्य लड़की होती तो वह शादी कर भी लेती लेकिन शाल्वी ने अपने आत्मसम्मान को बरकरार रखते हुए उसका भेजा हुआ पत्र बिना पढ़े ही उसे लौटा दिया. यह कहकर की जब उसे आशीष की सबसे ज्यादा जरूरत थी वह इसके जीवन में नही था, जब मैं दर्द से चीख रही थी मेरी आवाज सुनने के लिये वह नही था.

“ही इज ऑल्सो आ रेपिस्ट” उसमें इतना दम भी ना था कि सबके मुंह बन्द करके मुझसे विवाह करता. एक विक्टिम से विवाह और पतिता का उद्धार का भागीदार उसे अब मैं नही बनने दूंगी. मैंने पाप नही किया जो भयभीत होकर बुर्का पहनूं! मैं जिंदगी जिउंगी, मैं फिर जॉब करूंगी अकेले रहकर.

कहानी का अंत बहुत मजबूत है, क्योंकि अंत मे कथाकार ने सभी स्थापित घिसे पिटे तर्कों को अप्रमाणित घोषित कर दिया. कहानी की तारतम्यता कहीं से टूटी नहीं है. कहानी बेहद सहज है, अंग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग संवादों के बीच में कहानी की मांग है. कथा के बीच में गीताश्री का पत्रकार हमेशा सजग दिखता है. मुझे उनकी हर कहानी से पत्रकारिता की महक आती है। और अंत मे यही कहूंगी गीताश्री ने बलात्कार के दर्द को महसूस किया है जो उनकी कहानी में बखूभी उतरा है.