ABUSING से एक फिल्म की सेहत पर क्या असर पड़ता, कुंठित लोगो को SEXUAL PLEASURE जरुर मिल जाएगा

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गीताश्री:

वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका:

“ओ लड़कियों…ये Abusing कहां से सीखा, ऐसी गाली उच्चारने का दुस्साहस कहां से आया?

अपने समाज से पूछो…जिसके भीतर स्त्रियों को लेकर इतनी हिंसा भरी हुई है.

अब अमूर्त समाज से बहस कौन करे. क्या आप नहीं जानती कि आपकी भाषा ही आपके मनोविकारो को और आपके संस्कारो को प्रकट करती है.

ऐसे खयाल दिमाग में इसलिए घुमड़ रहे कि “बीरे दी वेडिंग (Veere Di Wedding) ” फिल्म के ट्रेलर में सोनम कपूर “बहन…” की गालियां निकाल रही हैं. आमतौर पर पढ़ी लिखी स्त्रियां इस तरह की Abusing खुलेआम नहीं करतीं.




इस दौर में तो ऐसी गालियां निकालते समय पढ़े लिखे पुरुष भी हिचकते हैं. मां- बहन की गालियां सीधे सीधे स्त्री अस्मिता पर पितृसत्ता की चोट होती है जो उनके अवचेतन में दबी, स्त्रियों के प्रति हिंसा को उजागर करती है.

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ऐसे समय में जहां स्त्री-पुरुष दोनों सचेत हो रहे हैं ऐसी गालियों के प्रति, फिल्म में युवा नायिका के मुंह से गाली दिलवा कर नये सिरे से गाली को स्थापित करने की बेजा कोशिश की जा रही है.

गीताश्री , वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका

इस गाली की जगह नायिका कुछ और कटु शब्द बोल सकती थी, फिल्म की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. सिर्फ एक गाली फिल्म नहीं चला सकती लेकिन कुंठित लोगो को Sexual Pleasure जरुर दे सकती है.

ये सच है कि युवा लड़कियों की दुनिया अत्यधिक खुली है. वैसे हर जमाने में स्त्रियों की दुनिया थोड़ी थोड़ी खुलती रही है और जब वे अपनी जमात में होती हैं तो सच में बहुत बेबाक होती हैं.

अकल्पनीय रुप से स्त्रियां बेबाक बातें करती हैं, अपनी फैटेंसी शेयर करती हैं और वे तमाम वर्जनाओं से ऊपर उठ कर बातें करती हैं, ठिठोली करती हैं. जहां कोई परदेदारी नहीं होती.

यह छुपी हुई दुनिया होती है जहां स्त्रियां एक दूसरे से वह सब कह डालती हैं जिन्हें परदे में रखना चाहिए. जिन्हें वह पितृसत्ता के सामने नहीं रख सकती या समाज में खुलेआम नहीं बोल सकतीं.




मैंने बहुत कम स्त्रियों को मां बहन की गाली देते देखा है. ग्रामीण स्त्रियों को गाली देते खूब सुना है जिसमें मां बहन की कम, शाप टाइप की गालियां ज्यादा होती थीं. शहरी इलाको में पढ़ी लिखीं स्त्रियां भी हमारे समय में अश्लील गालियों से परहेज करने लगी थीं.




गुस्से के इजहार के लिए नयी गालियों की खोज हमारी पीढ़ी ने की. हमारी समझ में आने लगा था कि पितृसत्ता को गाली देने के लिए हमें उन पर सीधी चोट करने वाली गाली खोजनी चाहिए, गढ़नी चाहिए, न कि स्त्री समुदाय को ही बेइज्जत करने वाली गालियां बोली जाएं.

कुछ लोगो के लिए गालियां उन्हें क्रोधमुक्त करती हैं, कुछ को रिलैक्स करती है और कुछ के भीतर की हिंसा को पोसती हैं. गालियों का भी अपना मनोविज्ञान है और समाजशास्त्र है.

आखिर अधिकांश भद्दी, फूहड़ गालियां स्त्रियों को ही केंद्र में रख कर क्यों बनाई गई जिसमें वे सिर्फ सेक्स ऑब्जेक्ट के रुप में नजर आती हैं. Male Ego इगो पर चोट पहुंचाने के लिए पुरुषों ने ही ऐसी गालियों का अविष्कार किया होगा. जो स्त्री को सिर्फ देह मानते रहे और पितृसत्ता की इज्जत के रुप में देखते रहे.

इसीलिए अस्मत पर चोट करने वाली गालियां गढ़ी गई ताकि मर्द तिलमिला उठें. गालियों का मनोविज्ञान कहता है कि गाली एक सेफ्टी बॉल्ब की तरह है जिसके माध्यम से भड़ांस निकाली जाती है. कुछ तर्क देते हैं कि गालियां शारीरिक हिंसा को रोकती हैं.

लेकिन पितृसत्ता की गढ़ी गई हिंसक गालियों का इस्तेमाल जब स्त्री करने लगती हैं तो बहुत फूहड़ लगती है. चाहे सिनेमा में ही उसका इस्तेमाल क्यो न हो?  हम ये मान सकते हैं कि अनपढ़ तबके की स्त्रियों में इतनी चेतना नहीं कि वे स्त्रीवाद के नए मानको के बारे में सोच विचार सके.

उनके मुंह से गालियां अस्वभाविक नहीं लगतीं. अगर कथित कुलीन वर्ग की लड़कियां मां बहन की गालियां दें तो कोई तर्क हजम नहीं होगा. उसके पीछे खुद को अत्यधिक मॉर्डन दिखाने की मंशा है या सचमुच अपनी भड़ांस निकालना है, ये तो उन्हें ही पता होगा.

सिनेमा में इसका इस्तेमाल सिर्फ चर्चा के लिए डाला जाता है, क्योंकि स्त्रीमुख से निकली हुई गालियां पितृसत्ता को ज्यादा रसास्वादन कराती हैं. उन्हें Sexual Pleasure देती हैं.

ये ठीक है कि फिल्म का निर्देशक लिखी हुई स्किरप्ट थमाता है लेकिन गाली उच्चारते समय आपकी जुबान, आपका फेमिनिज्म कहां चला जाता है? गालियों का स्वरुप बदला जा सकता है. मां बहन के बदले भाई, बाप तक पहुंचा जा सकता है, और भी गालियां हैं जिनके सहारे अपनी भड़ांस निकाली जा सकती है.

मां बहन की गालियां ही क्यों…?

मेरे आसपास कई पुरुष मित्र हैं जो दिन भर मां और बहन की गालियां निकालते रहते है, वे सुख में भी, मजाक में भी और आनंद के क्षणों में भी गालियां बकते हैं….उनकी बातचीत का लहजा यही है.

उनके जीवन की स्त्रियां Abusing की अभ्यस्त हैं. उन्हें कुछ बुरा नहीं लगता. धीरे धीरे उनकी स्त्रियां भी वही गालियां बकने की आदी हो जाती हैं. उन्हें कुछ भी अटपटा नहीं लगता. उन्हें मालूम नहीं कि अनजाने की उनकी कंडीशनिंग ऐसी कर दी गई है कि वे अपने ही समुदाय के खिलाफ हिंसक गालियां बकती रहती हैं.

सभ्य समाज के पूरे कूंएं में भंग पड़ी होती है. ये फिल्म भी उसी मानसिकता का शिकार है.

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