#MyFirstBlood-अलग CARPET पर बैठने को कहा और खाने-पीने के बर्तन अलग कर दिए गए.

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पीरियड पर आधारित हमारे कैंपेन #MyFirstBlood की 8वीं कड़ी में आज पढ़िए ग्वालियर से गीतांजलि गिरवाल के अनुभव. वे बताती हैं कि पहली बार पीरियड हुआ तो जाना कि इस दौरान लड़की अपवित्र कैसे हो जाती है? उन्हें अलग Carpet पर बैठने को कहा गया और खाने-पीने के बर्तन अलग कर दिए गए.

जब बचपन मे झांकती हूं तो बहुत कुछ ऐसा नज़र आता है जो गुदगुदाता भी है और रुलाता भी है. मातापिता नौकरीपेशा थे, हम दो बहनें व एक भाई है. बचपन मस्ती में बीता. पीरियड के बारे में कोई जानकारी नही थी. कोई बात करना भी पसंद नही करता था.




बेवकूफ़ी का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि आंठवी में एग्जाम में 5 नंबर का प्रश्न आया था कि “माहवारी के बारे में क्या जानते है,, समझाइए”. हम सवा छोड़ आे. मम्मी ने पूछा क्यो छोड़ा तो खीसें निपोरने लगे. तब ना हमें और ना मम्मी को लगा कि इस बारे में थोड़ी बहुत ही पर जानकारी दी या ली जाए खैर..




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हमसे पहले दीदी की माहवारी आ गई थी पर कैसे ये नही मालूम. मालूम तो बस इतना था कि हर महीने दीदी को कौआ छू लेता है और दीदी 4 दिन के लिए अलग थलग कर दी जाती थी. अब कौआ कैसे कब आता था और उसे कैसे मालूम था कि इसी तारीख़ को दीदी को घर मे घुस कर छूना है, इसका जवाब हमें कभी नही मिला.

अब इस अनुभव से गुजरने की बारी मेरी थी. मैं 9th में थी. 26 जनवरी, दिन गुरुवार, सुबह के 8 बजे माहवारी ने चुपके से, दबे पांव दस्तक दी. हम अंजान थे. सुबह नहा धोकर स्टेडियम परेड देखने गए थे. बढ़िया सा, सफ़ेद चितकबरा फ्रॉक पहने थे.




क़रीब 2 घंटे यूं ही घूमते रहे, फिर कुछ दिमाग में संवेदनाएं जागने लगीं. कुछ गीला सा महसूस हुआ पर क्या है ये समझ से कोसों दूर था. घर आए और इधर उधर घूमते रहे. घर पर कोई नही था पापा के सिवाय. पापा से बहुत क़रीब थे पर कुछ बोल नही पाए.

अब क्या करें तो क्या करें खड़ी साईकिल पर बैठ गए और पैडल मारने लगे. ओह्ह ये क्या, पीछे से पूरा फ्रॉक खराब हो गया, घबराहट होने लगी कि अब क्या करूं, किस से बोलूं? मुझे लगा शायद जांघ में कोई चोट लग गई होगी तो खून निकल रहा है. इसी स्थिति में दोपहार के 2 बज गए. बैठने से कपड़े और ज्यादा खराब होने का डर था सो, तब तक घूमती ही रही. आगे पीछे से ड्रेस खराब होता रहा.

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3 बजे मम्मी आई पर बोलने की हिम्मत नही हो रही थी. कहीं मम्मी गुस्सा ना हो जाए इसलिए दीदी का इंतजार करने लगी. कुछ देर बाद दीदी भी आ गई. अब में उसके अकेले होने का इंतज़ार करने लगी,, दीदी खाना खाने किचन में गई तब मैं झट से उसकी तरफ लपकी.

दीदी ने खाना शुरू ही किया था कि मैं वहां पहुंची और फ्रॉक को उठा कर शमीज पर के ख़ून के धब्बे दिखाते हुए लगभग रुआंसी आवाज़ में बोली,” दीदी कुछ बताऊं, तू मम्मी को तो नही बोलेगी ना. अब तक सुबह का रुका रोना फूट गया.

दीदी तूफ़ान की तरह मम्मी कहकर चिल्लाते हुए बाहर भागी. मुझे कांटो तो ख़ून नही, लगा कि आज शामत आने वाली है. मैं अपराधी सी किचन में ही खड़ी रही. कुछ देर बाद, मां बेटी आपसी सलाह मशवरा कर के मुस्कुराते हुए मेरे सामने खड़े थे. दीदी तो लगभग मुंह दबा कर हंसे जा रही थी.

फिर मम्मी ने माहवारी के बारे में समझाया और बताया कि ये हर लड़की के जीवन मे आता है. कुछ समझ आया कुछ नहीं. खैर मुझे सूती कपड़ा दिया गया. बहुत ही असुविधाजनक था वो एहसास, एक Carpet दे कर घर मे एक कोने में बैठा दिया गया, हिदायत दी गई कि किसी भी चीज को छुआ ना जाए.

बाथरूम जाना हो तो अपने कपड़ों को समेटते हुए, परदों व अन्य चीजों से दूर से निकला जाए. 4 दिन तक मीठा खाने को दिया गया. अपने कपड़े व बर्तन खुद ही साफ कर के और बर्तन कोने में उल्टे रखने का आदेश दिया गया. एक गिलास दिया गया, जब भी प्यास लगती थी, पानी मांगने पर उसमे दे दिया जाता था.

सब के नहाने के बाद हमारा नंबर आता रहा, एक कोने में Carpet पर बैठे बैठे कमर अकड़ जाती थी और घुटनें ऐंठ जाते थे. बहुत अपमान महसूस होता था, गुस्से और चिढ़ के मारे बुरा हाल हो रहा था. सोचने लगी कि ऐसा क्या पाप हो गया जो इस तरह से घर निकाला दिया गया. पीरियड में होने का इतना दुख नही था जितना दुख उस वक्त किये जा रहे व्यवहार का था.

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जैसे तैसे 4 दिन पूरे हुए और हमने चैन की सांस ली. फिर मालूम हुआ कि ये तो हर महीने आने वाली मुसीबत है. मेरा हाल बुरा हो गया, मैंने घर मे ऐलान कर दिया कि “हमे नही होना ये माहवारी से, अगले महीने से नही होंगे हम. फिर से दीदी व मम्मी के हंसने की बारी थी, तब बताया गया कि ये हमारे हाथ की बात नही है.

रो-रो कर बुरा हाल कर लिया अपना, पर कोई चारा था ही नही हमारे पास. अब हर महीने ये दर्द, ये अलग बैठना, ये कपड़ा लेना, ये मानसिक तनाव सब ना चाहते हुए हमारे जीवन का हिस्सा बन गए थे.

तब सेनेटरी नैपकिन का चलन बहुत ही कम था, दूसरा इसे फेंकने का झंझट सबसे ज्यादा था. अंत मे यही तय हुआ कि हमारे लिए कपड़ा ही सही है पर उसके साथ भी बहुत दिक्कत थी. मुझे 8 दिन तक बहुत अधिक मात्रा में खून जाता था जिससे हर 4 घंटे बाद कपड़ा बदलना होता था फिर उसे धो कर किसी कोने में छुपा कर सुखाना भी होता था.

अब जब भी पीरियड आने का समय होता तो में भयंकर मानसिक तनाव में आ जाती, मम्मी से लड़ती, चिखती- चिल्लाती. पूछती क्यों इतना छुपा कर रखा जाता है, इसमें गंदा क्या है? तब नानी का जवाब मिला कि ये गन्दा खून है जो हर महीने आता है इसलिए अलग रखते है छुपा कर रखते है, इस समय स्त्री अपवित्र होती है.

अब स्थिति बदली है, बहुत कुछ बदल गया है. आज वो माहौल नही है जो मैंने सहा. मेरी बेटी को समय से पहले ही मैंने ये सारी जानकारी दे दी थी. सफाई का ध्यान रखती हूं,उसे सैनेटरी नैपकिन को यूज़ करने का तरीका बताया है, उस पर किसी तरह का दबाव या रोक नही लगाई है. मैंने उसे खुली हवा में जीने का भरपूर मौका दिया है.

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