कृष्ण को CENTRE OF GRAVITATION क्यों मानते हैं हम?

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कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र. कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे.  कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे. प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है. वह Centre Of Gravitation है जिस पर सब चीजें खिंचती हैं और आकृष्ट होती हैं.

शरीर ख‌िंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, परिवार खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, समाज खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, जगत खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है. वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आस-पास सब घटित होता है.




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तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है. वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है. और उसके बाद सब चीजें उसके आस-पास निर्मित होनी शुरू होती हैं. उस कृष्ण-बिंदु के आस-पास क्रिस्टोलाइजेशन शुरु होता है और व्यक्तित्व निर्मित होते हैं. इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्ममात्र नहीं है, बल्कि व्यक्तिमात्र का जन्म है.

कारागृह में जन्म का अर्थ

अंधेरे का, कारागृह का, मृत्यु के भय का अर्थ है. लेकिन हमने कृष्ण के साथ उसे क्यों जोड़ा होगा? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जो कृष्ण की जिंदगी में घटना घटनी होगी कारागृह में, वह नहीं घटी है. मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जो बंधन में पैदा हुए होंगे, वह नही हुए हैं.

मैं इतना कह रहा हूं कि वे बंधन में हुए हो या न हुए हों, वे कारागृह में जन्मे हों या न जन्में हो, लेकिन कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो कि प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है.




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ध्यान रहे, महापुरुषों की कथाएं जन्म की हमेशा उलटी चलती हैं. साधारण आदमी के जीवन की कथा जन्म से शुरू होती है और मृत्यु पर पूरी होती है. उसकी कथा में एक सिक्वेंस होता है, जन्म से लेकर मृत्यु तक. महापुरुषों की कथाएं फिर से रिट्रास्पेक्टिवली लिखी जाती हैं. महापुरुष पहचान में आते हैं बाद में, और उनकी जन्म की कथाएं फिर बाद में लिखी जाती हैं. कृष्ण जैसा आदमी जब हमें दिखाई पड़ता है तब तो पैदा होने के बहुत बाद दिखाई पड़ता है.




इस तरह कृष्‍ण मानव से महामानव बन जाते हैं

वर्षों बीत गए होते हैं उसे पैदा हुए. जब वह हमें दिखाई पड़ता है तब वह कोई चालीस-पचास साल की यात्रा कर चुका होता है. फिर इस महिमावान, इस अद्भुत व्यक्ति के आस-पास कथा निर्मित होती है. फिर हम चुनाव करते हैं इसकी जिंदगी का. फिर हम रीइंटरप्रीट करते हैं. फिर से हम इसके पिछले जीवन में से घटनाएं चुनते हैं, घटनाओं को अर्थ देते हैं.

इसलिए मैं आपसे कहूं कि महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है. पीछे लौट कर निर्मित होती है. पीछे लौट कर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है, जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे. और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिदंगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है.

हजारों लोग लिखते हैं. जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएं होती चली जाती हैं. फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती. कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं. एक इंस्टीटयूशन हो जाते हैं. फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं. फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है. इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूं. कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति नहीं रह जाते. वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं. और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे है, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं.

 

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