हल्की हंसी का जवाब मुश्किल में बदल गया..

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crush or love affair
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रोशनी शर्मा:

शहर के एफएम रेडियो पर पूछा था एक छोटा सा सवाल, एक छोटी सी दुविधा को सुलझाने का किया था प्रयास, लेकिन उसकी यह कोशिश  ज़िंदगी में इतना बड़ा भूचाल ला देगी, इसका कतई अंदाजा नहीं था उसे. उसने तो  मन हल्का करने के लिए एफएम  को फोन कर दिया था. लेकिन एंकर ने हल्की हल्की हंसी में जो जवाब दिया वो बड़ी मुश्किल में बदल गई. लगा 15 साल की शादीशुदा जिंदगी एक पल में बिखर जाएगी.




गणगौर का दिन था. राजस्थान में सुहागपर्व के तौर पर ही मनाया जाता है यह त्यौहार. गणगौर की सवारी जयपुर के छोटी चौपड़ से होते हुए सरोवर की तरफ जा रही थी..मेले की अफरातफरी, रंग बिरंगे परिधानों में राजस्थानी महिलाएं अब भी मंगल गीत गा रही थीं. लड़कियां नई नई ड्रेस में उत्साहित , भागती दौड़ती सी, मेंहदी लगे हाथ, गुब्बारे वाले और खिलौने वालों का शोर, गोल-गप्पे वाले के ठेले पर लगती भीड़, बऱफे के गोले बनाने वाले के हाथ थम ही नहीं रहे थे और ताज़ा ताज़ा उतरते घेवर की सौंध, ललचा रही थी. हाथी, घोड़े ऊंट की सवारी, राजाओं के ज़माने के तरीके की आतिशबाज़ी, लट्टुओं की आवाज़ और रोशनी, एक के बाद एक करतब दिखाते कलाकारों के जुलूस और सजी धजी ड्रेस में बैंड बजाने वालों के ग्रुप और एक रथ में बैठे शहनाईवादकों से गूंजते घूमर के गीत और उसके पीछे पीछे करीब पचास से ज़्यादा युवतियों का घूमर पर पारपंरिक डांस, विदेशी सैलानियों के कैमरों की आवाज़ें ,  बच्चों के उत्साह का शोर…




बच्चों को लेकर आई वो भी तो खूब उत्साहित थी. मन आनंदित और उमंग से भरा था. खासतौर से लहरिया पहना था उसने. हरी-हरी चूड़ियों से भरे हाथ कभी एक हाथ से आठ साल की बेटी सुनयना को संभालते तो कभी दूसरा हाथ पांच साल के शैतान प्रभाव को पकड़ते, लेकिन वो बार बार छूटा जा रहा था, साथ में थे टूरिज्म डिपार्टमेंट में बड़े ओहदे पर बैठे उसके अफसर पति राजदीप. अपने कैमरे से मानो मेले के हर रंग को कैद करना चाहते थे. टूरिज़्म डिपार्टमेंट में बड़े अफसर होने की वज़ह से ऐसी खास जगह मिली थी उन्हें मेला देखने की जहां सिर्फ़ विदेशी सैलानी और बड़े बड़े वीवीआईपी लोग बैठते थे.




मेला देख कर उतर ही रहे थे तो पीछे से कोई जानी पहचानी सी आवाज़ से उसके पैर ठिठक से गए- सुलक्षणा .उसने पीछे मुड़कर देखा तो गोरा रंग, वो ही आकर्षक चेहरा हां, कानों के पास के बालों पर सफेदी झांक रही थीं. अनुपम यहां? सच में उसके लिए तो वो अनुपम ही था, लेकिन अचानक उसकी आवाज़ सुनकर वो घबरा गई, शरीर मानो पसीने से नहा गया हो. उसके पति ने भी उसके चेहरे के बदलते रंग को शायद भांप लिया था.

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वो मुस्कराई. उन्होंनें मुस्कराते हुए कहा–आप सुलक्षणा ही हैं ना. मैं अनुपम आपके साथ कालेज में था. हां, हां… गले में अटकते से शब्द बोले. पति से परिचय कराने के लिए मुड़ी तो अनुपम ने खुद ही उसके पति के तरफ हाथ बढ़ा दिये. जी माई सेल्फ अनुपम ट्रेवल एजेंसी चलाता हूं. मुंबई में. सिर्फ विदेशी सैलानियों के लिए यूरोप से बड़ा ग्रुप आया था और मुझे भी गणगौर देखनी थी तो इस बहाने आ गया. राजदीप ने कहा कि मैं यहां टूरिज़्म डिपार्टमेंट का अधिकारी हूं, ये इंतज़ाम मैं ही देखता हूं .. दोनों जोर से हंस दिए और कहा कि फिर तो ज़ोरदार जमेगी. राजदीप ने चलते-चलते अनुपम को दो दिन बाद  संडे को डिनर पर इनवाइट कर लिया.

रात बड़ी मुश्किल से निकली उसकी. करवटें बदलते हुए सोचते हुए. अनुपम कालेज टाइम से ही क्रश था उसका लेकिन कभी शायद कहने की हिम्मत ही नहीं पड़ी. वो थियेटर ग्रुप का हीरो भी था और वो अच्छी कमेंटेटेर और डिबेटर. रेडियो पर भी प्रोग्राम करती हर रविवार. जब भी कालेज में कोई फंक्शन होता तो किसी ना किसी बहाने टकराना हो ही जाता बातचीत भी होती लेकिन इससे आगे कुछ नहीं. कालेज के सालाना जलसे की तैयारियां चल रही थीं तब उसके थियेटर ग्रुप की हीरोइन जलसे से दो दिन पहले एक्सीडेंट में गंभीर रूप से घायल हो गई.

अनुपम को उस इमरजेंसी के वक्त सुलक्षणा से बेहतर कोई चेहरा नहीं दिखा और वो उसकी रिक्वेस्ट को मना नहीं कर पाई. बल्कि सच पूछो तो उसके मन की मुराद पूरी हो गई. ड्रामे के आखिरी सीन में हीरो–हीरोइन का सीन होता है, लेकिन जैसे ही वरमाला डालने का वक्त आता है कि अचानक थिएटर में शॉर्ट सर्किट से आग लग जाती है. भदगड़ शुरु हो गई पूरे थिएटर को खाली कराना पड़ा, शादी पूरी नहीं हुई…

वह कॉलेज का फाइनल ईयर था. उसके बाद दोनों की कोई मुलाकात ही नहीं हुई और फिर शादी के बाद वो राजदीप के साथ ज़िंदगी की रफ्तार में आगे चलती गई, दोनों प्यारे बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे और उसका वक्त ऐसे ही काम-धाम में निकल जाता.

रात भर वो अनुपम के बारे में सोचती रही. सवेरे राजदीप दफ्तर चले गए शाम को देर से लौटने की बात कह कर. दोपहर में अनुपम का फोन बजा तो उसके दिल की धड़कन बढ़ गई. वो चार बजे होटल में कॉफी के लिए बुला रहा था मना कर नहीं पाई. टेबल पर आमने-सामने बैठे मगर उससे कुछ बात नहीं हो पा रही थी. अनुपम ने पूछा कैसी चल रही है लाइफ?  उसने छोटा सा जवाब दिया-अच्छी है.

इस बार सवाल उसने पूछा- आपकी फैमिली?

अनुपम ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा – नहीं है क्योंकि शादी नहीं की.

क्यों ?

जिस लड़की को चाहा था उससे कह नहीं पाया. शायद पता नहीं था कि वो मुझे चाहती है या नहीं. इस डर से कभी कुछ बोल ही नहीं पाया.

कौन थी वो लड़की, क्यों नहीं कहा आपने उसे? एक साथ कई सवाल उसने जड़ दिए.

अनुपम ने सिर्फ उसकी आंकों में झांका और हल्का सा मुस्करा दिया ..

कॉफी खत्म करके निकले तो उसने संडे को आने का इनवाइट औपचारिक तौर पर दोहराया और जल्दी-जल्दी गाड़ी की तरफ बढ़ गई. गाड़ी में बैठते ही उसे अचानक क्या याद आया.. एफएम रेडियो पर फोन मिला दिया. उस वक्त प्यार में उलझे हुए लोगों का फेवरेट प्रोग्राम आता था, प्यार की परेशानियों का तुरंत जवाब लाइव.. उसने घुमा-फिरा कर पूछ ही लिया कि मेरा तो वो कालेज टाईम क्रश था, क्या वो भी मुझे प्यार करता था …एंकर ने जवाब के बजाय कहा कि आज अपने ही दिल से पूछिएगा, जवाब मिल जाएगा..धड़कनें और तेज़ हो गई.

संडे को डिनर के लिए उसने खास तैयारियां की थी. वो कुर्ते पायजामे में ट्यूलिप्स बुके के साथ दरवाज़े पर खड़ा था.वो गिरते-गिरते सी बची. पूरे डिनर में वो नज़रें बचाती रही. उसने सबका थैंक्यू किया. थक गई थी वो, लेकिन नींद नहीं थी आंखों में.  कमरे में मौन सा गूंज रहा था. फिर राजदीप का सवाल आया– क्या वो तुमसे प्यार करता था? वो एकदम घबरा गई. उसने पूछा कि ऐसा क्यों कह रहे हैं आप, हम तो कभी मिले ही नहीं कालेज के बाद.

राजदीप ने थोड़ी देर बाद करवट बदलते हुए फिर से सन्नाटा तोड़ा, नहीं तुम्हारा सवाल सुन रहा था कल एफएम रेडियो पर…इतना कहकह बाईं ओर करवट ले ली. मिनट भर में उसके खर्राटे की आवाज़ सुनाई दे रही थी, लेकिन सुलक्षणा को लगा कि किसी ने उसकी खून की सारी नलियों को सुखा दिया है…हल्की हंसी का जवाब ….मुश्किल में बदल गया….

 

(यह सच्ची कहानी है. अनुरोध पर इसमें पात्रों के नाम बदले गए हैं. यदि आप के पास भी कोई ऐसी कहानी तो हमें भेजें womeniaworld@gmail.com पर)

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