फिर भी दावा है देवी हो कर जीने का

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प्रितपाल कौर:

मैं एक देवी हूं

चाहे नाम मेरा सीता राधा या लक्ष्मी की तर्ज़ पर नहीं

फिर भी दावा करती हूं देवी होने का




 देवी हो कर जीने का

देवीत्व पा कर मरने का.

मैंने नहीं काटा कोई बनवास, मैंने कुटी छवाई

छौनों संग अपने पंख नहीं कटवाए अपने

ना रखने दी और ना लांघी कोई लक्ष्मण रेखा




मैंने लोभ करके स्वर्ण मृग का

नहीं भेजा किसी राम को बाण चलाने

मैंने ख़ुद कमर कस के चलाया हल महानगर की

सड़कों पर मैंने मैं मैं करते हुए भी

नहीं निकाला घर से अपना ही ख़ून

मैंने मैं मैं कर के समेटे रिश्ते

चिड़ियों, बैलों और कुत्तों से भी




मैंने किसी रोज़ दावा नहीं किया

किसी के जीवन निर्माण का

मैंने चलते चलते खर्रामा-खर्रामा

नई पीढ़ी को सौंपा देवत्व

मैं देवी हूं इस युग की मंदिर में स्थापित नहीं होना मुझे

मेरी तो तमन्ना सिर्फ़ इतनी कि अपने घर में

अपने बिस्तर पर हर रात सम्मान से सोऊं

हर सबह स्त्री की तरह उठूं मैं एक देवी हूं

हालांकि नाम नहीं मेरा लक्ष्मी राधा या सीता

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और कलमकार हैं)

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