MITHILA PAINTING में कैसे लोक गाथाएं गूंथ लाती हैं SEEMA SINGH

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Seema Singh
Seema Singh

गीताश्री:

(वरिष्ठ पत्रकार)

Seema Singh टी वी पत्रकार थी, खूब घूम घूम कर रिपोर्ट किया करती थी. टी वी पर खनकती आवाज में समां बांध देती थी. ये टीवी के शुरुआती दिनों की बात है. कला-संस्कृति से उसे बहुत लगाव था खासकर Mithila Painting से.

उसके पूरे पहनावे और रहन-सहन में कला-प्रेम की झांकी मिलती थी. गली-गली घूम कर अपने लिए लोक कलाएं ढूंढा करती जिन्हें या तो पहनना होता था या घर में रखना. मैं उसे संस्कृति की झांकी कहा करती थी. उसे जुनून था, सबसे अलग दिखने का और लोक कलाओं को संजोना का. 




समय बदला. उसने पत्रकारिता छोड़ी लेकिन लोक कला से मोहब्बत इतनी गहराती गई कि उन्होंने दिल्ली के वसुंधरा इंक्लेव फेज में मधुबनी कला का सेंटर ही खोल लिया. अपने शौक को अपना काम बना लिया.

जुनूनी है Seema Singh. बात-बात पर खिलखिला उठने वाली और लोक कला पर झूम उठने वाली. Mithila Painting को दीवारों से उतार कर पोशाकों, परदों, चादरों तक में पहुंचाने पर आमादा सीमा बहुत आशान्वित है कि घर घर पहुंच रही लोक कलाएं. 

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सीमा सिंह बताती हैं कि हैंडलूम और हैंडक्राफ्ट मेरी पसंद रही. मैंने पत्रकारिता की शुरुआत ऑल इंडिया रेडियो से की . युववाणी और एफएम गोल्ड में काम किया.  इन कार्यक्रमों में भी कला-संस्कृति का जिक्र जरुर करती. फिर सिलसिला चल निकला. बीएजी प्रोडक्शन हाऊस के बाद  मैं सहारा पहुंची.

2006. तरंगिनी प्रोडक्शन शुरु किया. वीडियो डॉक्यूमेंट्री बनाई. ग्रासरुट लेवल पर महिलाओं और बच्चों के लिए कई फिल्में बनाईं. 2014 में यूएस चली गई. वहां भी एक ग्रूप से जुड़ कर डॉक्यूमेंट्री बनाती रही. एक साल बाद जब लौटी तो बच्चों को सेटल करने में कुछ समय निकल गया.




वे बताती हैं कि उनकी बेटी छोटी है, डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए बाहर निकलना मुश्किल होने लगा. उसके आसपास रहने के लिए मैंने कला के जरिए कोई काम करने की सोची, तो बिहार से होने के नाते पहला ख्याल Mithila Painting का आया.

दिसंबर 2016 में काम शुरु कर किया. प्रधानमंत्री मुद्रा लोन के लिए आवेदन किया. हाथ में पैसा नहीं था हौसला था. चार महीने दौड़ने के बाद भी लोन नहीं मिला. पति से पैसे लेकर उन्होंने काम शुरु कर दिया. नई साड़ियां बनवाईं. साड़ियां बेचकर दुकान का किराया दिया. उनके साथ अभी 30-40 महिलाएं काम कर रही हैं.

कुछ बुनकर भी उनके साथ है लेकिन उनमें ज्यादा पुरुष है. शुरु में कलाकारों से सीधा संपर्क करने में उन्हें मुश्किल आ रही थी लोग इन कलाकरों को कई-कई महीने पैसे नहीं देते थे, इसलिए वे आसानी से काम करने को तैयार नहीं थे, लेकिन उन्होंने समय पर पैसा देना शुरु किया  तो कलाकारों का विश्वास सीमा पर विश्वास बढ़ा. वे हर छोटे-बड़े काम को एक प्रोजेक्ट के तौर पर लेते हैं.




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चित्रों में कैसी लोक-गाथाएं गूंथी जाती हैं इसके लिए सीमा बार बार जड़ों की तरफ लौटती हैं, मिथिला पेंटिंग के गढ़ में जाकर नए नए डिजाइन लाती है. कोहवर, तुलसी चौरा और भित्ती से निकली हुई कला आज कहां- कहां पहुंच गई.
मिथिला पेंटिंग की छाप वाले कपड़े भी मिलते हैं लेकिन वह सुख कहां जो हाथ से बने चित्रों में हैं. रंगों की खुशबू और रुपाकारो की गाथाएं…
स्त्रियां रचती हैं…
सीमा हम तक पहुंचाती है…
एक पत्रकार का यह सामाजिक- सांस्कृतिक पक्ष है.
यह हॉबी को काम बनाने का जुनून है.
उसने बनाया है– roots tale community