RANA SAFVI-उम्र के इस पड़ाव पर हमारे गौरवपूर्ण इतिहास को नई पीढ़ी से रूबरू जो करा रहीं..

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डॉ कायनात क़ाज़ी

ट्रैवलर, फोटोग्राफर, ब्लॉगर:

आज मैं आपको एक ऐसी शख्सियत से मिलवाउंगी जो एक जानी मानी इतिहासकार, लेखिका है, ब्लॉगर हैं और हमारे गौरवपूर्ण इतिहास को नई पीढ़ी से रूबरू करवाने का काम कर रही हैं. Rana Safvi अपनी तहज़ीब को सहेजने के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए हैं जिनके लिए इन्हे 2017 में HT Write choice award से भी नवाज़ा गया है.




जीवन के उत्तरार्ध में जब महिलाएं नाती- पोतों को खिलाने में ही अपनी सार्थकता खोजती हैं वही Rana Safvi ने ख़ुद को Rediscover किया है. साठ की उम्र तक पहुंचते हज़ारों महिलाएं ऐसी होंगी जो ज़िन्दगी में कुछ करने का सपना कब का छोड़ चुकी होंगी लेकिन इन्होंने जीवन के इस उत्तरार्ध में अपनी ज़मीन ख़ुद तलाशी है.

Pik Courtesy: HT

उनका पॉपुलर ब्लॉग है ‘Hazrat e Dilli’ जिसके जरिए वे लोगों को दिल्ली के सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पलहूओं से रुबरु कराती हैं. यहां उन्हें पाठकों का ढेरों प्यार मिलता है. आइये राना सफवी से सुनते हैं उनकी दास्तान……

कुछ अपने बारे में बताएं

मैं चार बहनों में से एक हूं. मेरे पिता और मां ने हमें कभी यह एहसास नहीं होने दिया के हम लड़कों से कुछ अलग हैं. मेरी एक बहन डॉक्टर है, दो टीचर हैं. मैंने भी कुछ साल टीचिंग की है. मेरी पढाई लखनऊ और अलीगढ में हुई. एम के बाद शादी हो गयी और मैं अपनी दुनिया में मगन थी. हमारे दो बच्चे हैं. अब दोनों बड़े हैं और सेटल्ड है.




पति के ट्रांसफर्स होते रहते थे और मुझे हमेशा से घूमने का शौक़ था तो हम हर जगह का पूरा मज़ा उठाते थे. काफी हिंदुस्तान घूमा। फिर मिडिल ईस्ट में जॉब ले ली और दुनिया घूमी.

आज आप जहां तक पहुंची हैं, यह सफर आसान तो बिलकुल नहीं रहा होगा. कुछ बताएं अपने संघर्ष के बारे में.

जब बच्चे बड़े हो गए तो बहुत खालीपन का एहसास होता था और तब लगता था के मैंने भी अपने बाक़ी साथियों की तरह नौकरी क्यों नहीं की. संघर्ष तो कोई नहीं था सिवाए अपने ही इस एहसास के कि मैं बहुत कुछ कर सकती थी अपने जीवन में, लेकिन मैंने नहीं किया. मैं अपने क्लास की टॉपर थी. बहरहाल जो वक़्त पलट नहीं सकता उसका कुछ हो नहीं सकता.

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हम सब सपने देखते हैं, आप भी जब छोटी होंगी तो ज़िन्दगी के लिए कुछ सपना देखा होगा? क्या था वो सपना ?

हमारे घर में कभी कोई रोक टोक नहीं था. यह आज़ादी थी कि जिसको जो बनना है बनो, लेकिन मैं कभी एंम्बिशियस  नहीं थी. सपना तो सिर्फ एक छोटे से परिवार का था वह मुझे अल्लाह के कर्म से मिल गया था.




उस लम्हे के बारे में बताएं जब आपको लगा कि यह मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट है.

मेरे  पति सऊदी  में  थे तो वह  टॉस्टमास्टर्स इंटरनेशनल करके एक आर्गेनाईजेशन का हिस्सा बने. वह  International Public Speaking प्लेटफार्म है.

मैं वहां पढ़ाती थी और मेरे पास बहुत वक़्त था. मैं भी उससे जुड़ गई. मैंने बहुत इनाम जीते और मैं सऊदी अरबिया में पहली महिला प्रेजिडेंट बनी टॉस्टमास्टर्स इंटरनेशनल क्लब की.

in conversation of the lessons to be learnt from Dastan e Ghadar (Courtesy: twitter)

लेखन के पेश में कैसे आईं? 

उसी दौरान में मेरी मां का इन्तक़ाल हो गया. मैं बहुत दुखी थी. एक दिन मैंने उनके बारे में लिखना शुरू किया और लफ्ज़ उमड़ते गए. लोगों को वह लब्ज छू गये और मेरे लिखने की वह शुरुआत थी.

डॉ कायनात क़ाज़ी
डॉ कायनात क़ाज़ी

2009 में मैंने Twiter अकाउंट खोला और वहां Tweet की. पढ़ाना तब तक छोड़ चुकी थी लेकिन Tweets मेरे बहुत इन्फोर्मटिवे होते थे. एक टीचर शायद कभी टीचिंग नहीं छोड़ती फिर 2011 में मैंने #shair शुरू किया और वह Twiter पर बहुत लोकप्रिय हुआ.  मेरे पास राइटिंग के ऑफर्स आने लगे.

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2014 में मैं हिंदुस्तान वापस आ गई और एक फुल टाइम राइटर बन गयी. मैं बाकी सबसे 35 साल पीछे थी इसलिए दिन रात पढ़ती थी, रिसर्च करती थी और लिखती थी.

मेरी पहली किताब 2015 में आी और उसके बाद अल्लाह की कृपा से बहुत काम मिला. अब आज मेरा एक अपना मुक़ाम है. लोग मुझे पहचानते हैं और जानते हैं। सोशल मीडिया पर मेरी ट्रोलिंग भी बहुत होती है लेकिन मैं अपनी बात रखने से नहीं घबराती. मैं गंगा जमुनी तहज़ीब के माहौल में पली हूं और मैं मरते दम तक उसकी बात करती रहूंगी.

आप महिला को क्या सन्देश देना चाहेंगी ?

मेरा पैग़ाम है के कभी देर नहीं होती किसी की ज़िन्दगी में. जब मौक़ा मिले अपने ख्वाब को पाओ.

 

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