प्रितपाल कौर की किताब ‘राहबाज़’ एक मर्द और दो औरतों की उलझी-सुलझी कहानी, BOOK FAIR में हुआ लोकार्पण

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Book Fair
प्रितपाल कौर की किताब 'राहबाज़' ,BOOK FAIR में हुआ लोकार्पण

प्रतिभा ज्योति:

ज़िन्दगी की पहेलियों का भी अपना अलग हिसाब किताब है. खासकर जब इनके केंद्र में स्त्री पुरुष हों. इन गुत्थियों के साथ खूब खेला है वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका प्रितपाल कौर ने अपनी किताब ‘राहबाज़’ में. सोमवार को Book Fair में उनकी किताब ‘राहबाज़’ का लोकार्पण हुआ.




किताब का लोकापर्ण किया वरिष्ठ लेखक, रचनाकार, कथाकार, नाटकाकर और उपान्यसकार असगर वजाहत ने. यह अनन्य प्रकाशन की ‘फास्ट फिक्शन’ श्रृंखला की नयी प्रस्तुति है. श्रृंखला संपादक अभिषेक कश्यप हैं.




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प्रितपाल कौर का नया उपन्यास ‘राहबाज’ यह बताता है कि महानगरीय जीवन में एक मिडिल क्लास जिंदगी जीने वाले स्त्री-पुरुष के संबंध किस तेजी से बदलते हैं. वे कहती हैं कि अब समाज में बोल्डनेस आ गया है. अब अपने आप को छिपा-कर दबा कर रहने वाली महिलाएं भी कम हो गई है.




प्रितपाल बताती हैं ‘राहबाज़’ किसी की थोड़ी सच्ची कहानी है और जिसमें उन्होंने अपनी कल्पनाशीलता का भी प्रयोग किया है. उपन्यास एक मर्द और दो औरतों की उलझी-सुलझी कहानी है और तीनों बोल्ड कैरेक्टर हैं.

पेश है उपन्यास का एक अंश….

मैं अन्दर दाखिल हुआ तो उसकी मुस्कान ने मुझे बांध लिया. इससे पहले एक बार ऐसा हुआ था कि मैंने उसकी दोस्ती में रोमांस को शामिल करना चाहा था और एक बार गाडी में उसका हाथ पकड़ लिया था.

वो नाराज़ हो गयी थी और मेरा हाथ झटक कर बोली थी, “तुम मर्द हर वक़्त बस एक ही बात सोचते हो. क्या औरत और मर्द सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते? जैसे दो मर्द या दो औरतें होती हैं.”

मैं शर्मिंदा हुआ था और मैंने उसी वक़्त उससे माफी मांग ली थी. उसके बाद हम कई बार मिले थे. फिल्म भी साथ देखी लेकिन एक शारीरिक दूरी हमारे बीच अलिखित समझौते के तहत बनी रही. मैंने फिर कभी कोशिश नहीं कि उसे छूने की.

एक दो बार मुझे एहसास हुआ कि वो नज़दीक आ जाती. कभी उसका घुटना मेरे घुटने से लग जाता और उस वक़्त उसकी ऑंखें अजीब तरीके से मुझ देख रही होतीं. जैसे मेरे अन्दर के इंसान की उसे तलाश हो.

मैंने इन सब को सिर्फ इत्तिफाक समझा और खुद को आगे बढ़ने से रोके रखा. वैसे भी मैं एक शरीफ मर्द हू. औरत की मर्ज़ी के बिना मैं उसके बदन को छू कर आयी हवा को भी नहीं छूता.

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लेकिन आज जिस तरह मुझे रोज़ी ने न्यौता दिया था और साफ़ कहा था कि डिनर में हम दोनों ही मौजूद होंगे तो मेरी दिल में एक उम्मीद जगी थी. जो ज़ाहिर है इस वक़्त रोज़ी के बर्ताव से उसे हवा मिल रही थी. मैं अन्दर दाखिल हुआ और लिविंग रूम के सोफे पर जा कर बैठ गया.

“क्या पियोगे?” रोज़ी मेरे सामने खडी थी. उसने एक सफ़ेद रंग का झीना सा टॉप और काले रंग की जाली वाली शॉट्स पहन रखी थीं.

मेरी आंखें उसकी सुडौल जांघों और टांगों में अटक कर रह गयी थी. मैं जानता हूँ ये सरासर बद्त्त्मीज़ी थी लेकिन मेरी तमाम कोशिश के बावजूद मैं अपनी नज़रें वहां से हटा नहीं पा रहा था.

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