#PressForProgress- क्या वो महिला दिवस आ गया जिसका हमें इंतजार है?

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#PressForProgress
Womeniaworld wishes you a Happy Women's Day

प्रतिभा ज्योति:

#PressForProgress की थीम के साथ  आपको International Women’s Day की आपको बहुत शुभकामनाएं. वैसे तो रोज ही हमारा दिन होता है लेकिन कभी-कभी विशेष तौर इसे मनाने में कोई हर्ज नहीं.




जैसे जन्मदिन पर याद आता है कि हम कितने बड़े हो गए, अब तक जिंदगी में क्या खोया-क्या पाया उसी तरह आज के दिन इस बात पर जिक्र कर सकते हैं कि क्या वह महिला दिवस आ गया है जिसका हमें इंतजार है?

1975 में अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष के दौरान यूनाइटेड नेशन्स ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाना शुरू किया. तब से हर साल इस तारीख को महिलाओं के नाम समर्पित किया गया है.




महिला दिवस मनाने का असली महत्व यह है कि हम महिलाओं को उनकी शक्ति और उनको अपने अधिकारों की सही पहचान करने का अवसर दें, लेकिन क्या पहले हम खुद को स्वीकार करते है? दूसरों की बात छोड़िए क्या हम खुद के भीतर की अपनी शक्ति को पहचान पाते हैं?

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इस बार महिला दिवस की थीम है #PressForProgress जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए प्रोत्साहित करना है. सवाल यह है कि कौन है जो हमें अधिकारों से वंचित रख रहा है? कहीं हम खुद ही तो नहीं जो अपने अधिकारों को पाना ही नहीं चाहते?
पहले तो हम खुद की क्षमता पर भरोसा ही नहीं करते इसलिए अपने अधिकारों का पाने के प्रति चेतना नहीं जगा पाते हैं. समाज के प्रति अपने योगदान का श्रेय खुद नहीं लेना चाहते इसलिए मान नहीं होता. मान उसका ही होता है जिसके योगदान को महत्व माना जाता है. जो खुद को नहीं समझता उसे दूसरे क्या समझेंगे?




जिन महिलाओं ने खुद पर भरोसा किया और उन्होंन ने चारदीवारी से बाहर निकलकर कई मुकाम हासिल किए हैं. लेकिन महिलाओं और बच्चियों के साथ हो रहे अपराधों के बढ़ते आंकड़ें भयावह होते जा रहे हैं जो डराने लगते हैं. केवल दिल्ली की ही बात करें तो 2011 से 2016 के बीच रेप के 277 फीसदी मामले दर्ज किए गए हैं. पिछले पांच साल में रेप के मामले तीन गुणा बढ़ गए हैं.
ऐसे में लगता है महिला दिवस का उत्सव मनाने में कैसी सार्थकता है? लेकिन देखने वाली बात है कि ऐसे अपराधों के खिलाफ अब कुछ महिलाएं खुल कर बोलने लगी हैं और उसकी रिपोर्ट भी दर्ज होने लगी है. ऐसा नहीं कि अपराध पहले नहीं होते थे लेकिन सामाजिक परिस्थितियों में फर्क आने लगा है.

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अब महिलाएं खुल कर बोलने लगी हैं और ऐसा उसके साहस दिखाने के कारण हुआ है. यह सकारात्मक है कि सिर्फ शहरी नहीं ग्रामीण इलाकों की महिलाएं भी अब चुप्पी नहीं रखती. रोज-रोज के घरेलू हिंसा से तंग रहने वाली ग्रामीण महिलाओं की शराबबंदी कराने के प्रयास को इसी तरह देखना चाहिए.
स्त्री को एक इंसान के तौर पर ऐसे ही स्वीकार्य किया जाए जैसा ईश्वर ने बनाया है. हम असीमित क्षमताओं की मालिक हैं लेकिन पुरुषों के साथ प्रतिस्पर्धा करना हमें हमारे मूल मकसद से भटका देता है. हमारी लड़ाई तो बस हमारे वो सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अधिकार हासिल करने के लिए जो एक नागरिक के तौर पर किसी को मिलना चाहिए.
इसके इसके लिए अपनी लड़ाई जारी रखनी चाहिए. जो हिंसा, दमन और शोषण सह कर भी चुप हैं उन्हें झकझोरिए, जगाइए, चुप मत रहिए. अभी बहुत चलना है….उस महिला दिवस के इंतजार में….

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