निर्मला सीतारमण के DEFENCE MINISTER बनने पर उल्लास क्यों?

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रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण
निर्मला सीतारमण ,रक्षामंत्री

रीवा सिंह:

नरेंद्र मोदी सरकार की कैबिनेट में फेर-बदल में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है वो वह है कि भारत को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद Nirmala Sitharaman के रूप में महिला Defence Minister का मिलना. सीतारमण से पहले इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए बतौर रक्षामंत्री कार्यभार संभाल चुकी हैं. लेकिन यह पहली बार होगा कि देश की रक्निषा का भार पूरी तरह एक महिला के हाथ में होगी. निश्चय ही यह हर्षोल्लास का अवसर है. उस क्षेत्र का मंत्रालय किसी महिला को सौंप दिया जाना जहां मेडिकल की शिक्षा के लिए भी लड़कियों को कम ही सीटें मिलती हैं, एक अच्छी ख़बर है.




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2010 में एएफ़एमसी (आर्म्ड फ़ोर्स मेडिकल कॉलेज) के आवेदन हेतु 120 रिक्तियां थीं जिनमें 105 सीटें लड़कों के लिए और 15 सीटें लड़कियों के लिए विभाजित थीं. ऐसे में महिलाओं का रक्षा-क्षेत्र का कर्णधार बनना सुखद है पर सोशल मीडिया और ख़बरों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि चारों ओर निर्मला सीतारमण के महिला रक्षा मंत्री होने पर बधाइयां दी जा रही हैं और महिला सशक्तिकरण की बात की जा रही है. बतौर वाणिज्य मंत्री निर्मला के कार्य को नज़रअंदाज करते हुए उनकी कार्य-कुशलता व दक्षता से मुंह मोड़ते हुए केवल महिला के रक्षा मंत्री होने की बात से समाज आह्लादित हो रहा है.




दूसरे मंत्रालयों में भी फेर-बदल हुई है पर अभी रक्षा मंत्रालय की बागडोर एक महिला को सौंपे जाने की बात करते हुए लोकतंत्र और गणतंत्र में समभाव का गीत गाया जा रहा है. बेशक ये उल्लास का अवसर है पर ज़रा रुककर विचार करें, क्या आप महिलाओं का ऐसा उत्थान चाहते हैं? क्या आप इसी बराबरी के सपने देखते हैं?




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असल मायनों में महिलाओं का सशक्तिकरण तब होगा जब आप उनके महिला होने की बेचारगी को दरकिनार कर उनका मूल्यांकन कर सकेंगे. जब औरतें बिना 33% आरक्षण भी गांवों के पंचायत से लेकर संसद के गलियारों तक खचाखच दिखाई देंगी. समभाव तब नहीं आएगा जब आप किसी महिला के मंत्री होने पर या मंगल ग्रह पर पहुंच जाने पर वाह-वाह करेंगे, समभाव तब आएगा जब एक औरत का रक्षामंत्री होना एक सामान्य घटना होगी, कोई उत्सव नहीं.

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