क्या फिर एक महिला जाएंगी राष्ट्रपति भवन?

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प्रतिभा ज्योति:

क्या राष्ट्रपति भवन एक बार फिर महिला का इंतज़ार कर रहा है?  क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यूपीए की तरह प्रतिभा पाटिल के बाद किसी महिला को ऱाष्ट्रपति भवन भेजना चाहते हैं? क्या एक बार फिर कोई महिला गवर्नर राजभवन से सीधे राष्ट्रपति भवन पहुंचने की कोशिश में हैं? क्या इनमें द्रौपदी मुर्मु का नाम सबसे ऊपर चल रहा है?

राष्ट्रपति चुनाव का बिगुल बज गया है.17 जुलाई को मतदान होगा और 20 जुलाई को देश को नया राष्ट्रपति मिल जाएगा. राष्ट्रपति उम्मीदवार के नाम को लेकर अटकलों का दौर शुरु हो गया है. बीजेपी ने अपने तीन नेताओं राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और वेकैंया नायडू की कमेटी बना दी है, जो सहयोगी दलों के साथ उम्मीदवार के नामों पर सलाह मशविरा करेगी फिर विपक्षी दलों से भी इस पर सहमति बनाने की कोशिश करेगी.

वहीं यूपीए ने दस सदस्यों की कमेटी बना कर राष्ट्रपति चुनाव में सक्रियता तेज़ कर दी है. वोटों के नंबर के हिसाब से विपक्ष का कोई उम्मीदवार राष्ट्रपति नहीं बन सकता, लेकिन वे एनडीए पर दबाव बनाने की कोशिश में है ताकि एक सर्वसम्मत नाम तय हो, साथ ही इसके बाद उप-राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष अपनी बात मनवाने में कामयाब हो सके.

राष्ट्रपति चुनाव को विपक्ष एकता की पहल के तौर पर देख रहा है. यह पहल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर विपक्ष की एकजुटता का सुझाव दिया था. इसके बाद सोनिया सक्रिय हुई. नीतीश कुमार ने प्रणब मुखर्जी को दोबारा उम्मीदवार बनाने की बात भी कही, लेकिन वे तैयार नहीं हैं. मौजूदा हालात में एनडीए उम्मीदवार की जीत तय है.

बीजेपी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला, झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मु और सामाजिक कल्याण मंत्री थावरचंद गहलोत का नाम भी चर्चा में है. खासतौर पर द्रौपदी मुर्मु का नाम कई तरफ से सामने आ रहा है.

मूलरूप से ओड़िशा की और आदिवासी समुदाय की द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर बीजेपी समाज के वंचित तबकों की सकारात्मक संदेश दे सकती है. कुछ समय बाद गुजरात, हिमाचल, कर्नाटक और फिर ओड़िशा में भी विधानसभा चुनाव होने हैं और इनमें से कुछ राज्यों में आदिवासी मतदाता खासी तादाद में हैं. कांग्रेस के लिए द्रौपदी मुर्मू का विरोध करना राजनीतिक रूप से काफी मुश्किल होगा.बीजेडी के सामने तो समर्थन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचेगा.

रुकावट-

हालांकि द्रौपदी मुर्मु के राष्ट्रपति बनने की राह में उनका कम अनुभव सामने आ सकता है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि द्रोपदी मुर्मु के पास लंबा राजनीतिक अनुभव नहीं है और अभी उम्र भी कम है, साध ही बीजेपी या संघ परिवार के लिए उन्होंनें कोई बड़ा योगदान नहीं दिया है.

लंबे समय तक कांग्रेस सांसद के तौर पर राज्यसभा में उप सभापति रहीं और पूर्व केन्द्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला वाजपेयी के वक्त बीजेपी में आईं थी. उनके पास राज्यसभा और राजनीति का लंबा अनुभव है. राष्ट्रपति बनाने को लेकर उनका नाम भी दौड़ में शामिल है.

रुकावट-

मौजूदा उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के होने की वजह से बीजेपी फिलहाल राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति दोनों पदों के लिए मुस्लिम उम्मीदवार को लाना नहीं चाहतीं. यही वजह नजमा हेपतुल्ला के राष्ट्रपति बनने की राह रोक सकती है.

लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का नाम भी चर्चा में है. वरिष्ठता और अपने मृदुल स्वभाव की वजह से वे कई नेताओं की पसंदीदा है.

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लेकिन उनको लोकसभा के अध्यक्ष पद से हटाकर राष्ट्रपति भवन भेजने का मतलब फिर लोकसभा सीट के लिए उप चुनाव करवाना है. लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर उनका कामकाज भी सराहनीय माना जा रहा है.  

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नाम पर भी बीजेपी में चर्चा हुई है. वे काफी राजनीतिक अनुभवी और विभिन्न राजनीतिक दलों में भी उनके रिश्ते अच्छे हैं.

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उनका खराब स्वास्थ्य इसमें आड़े आ सकता है .

राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार का बहुत महत्व है. कई बार गठबंधन के दल उम्मीदवार के हिसाब से अपना रुख तय करते हैं. ऐसे  कई मौके आए हैं , जब सहयोगी दलों ने उम्मीदवार के कारण अपना रुख बदला है. 2007 में  बीजेपी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भैंरोसिंह शेखावत थे और कांग्रेस की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल थीं. बीजेपी की सहयोगी शिव सेना ने महाराष्ट्र से संबंध होने के कारण भैंरोसिंह शेखावत की बजाय प्रतिभा पाटिल के समर्थन का फ़ैसला किया. 

मौजूदा वक्त में शिव सेना और अकाली दल से बीजेपी के रिश्ते मधुर नहीं हैं, लेकिन लगता नहीं कि वे बिना किसी मजबूत वजह के बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ जाएंगें.. सबकी निगाहें  बीजेपी उम्मीदवार पर हैं.और सब जानते हैं कि आखिरी फैसला प्रधानमंत्री नरेन्द् मोदी को करना है.

 

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