प्रीता भार्गव मर्दों की जेल में वे कैसे बन गई पहली LADY DIG

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उदयपुर के केन्द्रीय कारागृह की जेल अधीक्षक प्रीता भार्गव DIG Jail बनने वाली देश की पहली महिला अधिकारी बनी हैं. हाल में ही उनका प्रमोशन इस पद पर हुआ है, लेकिन इस पद पर पहुंचने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया है. परिवार वालों ने तो उनकी पढ़ाई छुड़वा ही दी लेकिन उन्होंने विपरीत परिस्थिति में भी हार नहीं मानी.

वे बताती हैं कि उनका बचपन एक किसान परिवार में धौलपुर में गुजरा. उस समय धौलपुर और उसके आस पास के इलाके चंबल के बीहड़ में डकैती व अपराध की समस्या से जूझ रहे थे, जिसका मेरी जिंदगी पर गहरा असर हुआ. 1975 में जब मैंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की उस समय पिताजी और दादाजी डकैतों के समर्पण करवाने के सिलसिले में सक्रिय थे. हमारे खेतो में भी डकैतों के समर्पण से जुड़े कार्य भी किए गए. उस वक्त डकैतों की जिंदगी को मैंने गहराई से महसूस किया. प्रीता बताती है कि चम्बल इलाकों में महिला को बेचने की बातों ने भी मेरी जिंदगी पर गहरा असर डाला. 




परिवार में था पढ़ाई छोडने का दवाब

वे जब पढ़ाई कर रही थीं उस वक्त लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाने का बेहतर माहौल नहीं था. घरवालों ने 11वीं की पढ़ाई करने के बाद आगे की पढ़ाई की इजाजत नहीं दी, लेकिन उन्होंने परिवार से छिपा कर अपनी पढ़ाई पूरी की. स्नातक के बाद आरएएस की परीक्षा दी. 1982 में पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण हो गई. उस वक्त परिवार को खुशी हुई लेकिन जेल सेवा में नियुक्ति मिलने से दोबारा परीक्षा देकर अन्य विभाग में नौकरी करने को कहा. मजबूरन 1983 में दोबारा परीक्षा दी और फिर चुनी गई लेकिन इस बार सहकार सेवा में नियुक्ति मिली लेकिन उन्हें आत्मसंतुष्टि नही मिली . सबके विरोध के बावजूद 1984 में उदयपुर के कारागृह में पहली महिला जेल अधीक्षक बनकर ज्वाइन कर लिया.

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जेलों में किए कई सुधार कार्य

उन्होंने बंदियों के सुधार और उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए कई सुधार कार्य किए हैं. जेल को अपना परिवार और स्वयं को परिवार की मुखिया मानकर बंदियों के भीतर छुपी अच्छाइयों को निखारने का प्रयास किया. वे कैदियों खेल कूद, ध्यान, कौशल विकास करने और उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग देने पर फोकस रखती हैं. 
बंदियों की तकलीफों पर प्रीता ‘बाकी सब खैरियत’ नाम से एक काव्य कृति भी लिख चुकी हैं. इसका अंग्रेजी में ट्रांसलेशन उनके अजमेर जेल में नियुक्ति के दौरान वहां जेल में बंद एक कैदी ने ही किया था. इस कृति में बंदियों की जिंदगी को बड़ी ही खूबसूरती से प्रीता ने अपनी कविताओं में पिरोया है, जिसे खूब पसंद किया गया.




सख्त छवि के पीछे रचनात्मकता

प्रीता अपनी सख्त छवि के लिए जानी जाती हैं लेकिन उनके अंदर एक रचनात्मक कोमल मन छुपा हुआ है. उन्हें  बचपन से ही लिखने और पेटिंग बनाने का शौक था. इसके अलावा वे कविता और कहानी भी लिखती हैं. उनकी प्रथम काव्य कृति ‘छूटे घर की दीवारें’ के लिए उन्हें आचार्य निरंजन नाथ पुरुस्कार से सम्मानित किया गया. उनकी दूसरी काव्य रचना “तुम हो इसीलिए” भी चर्चित रही हैं. इसके अलावा आज के समय की संघर्षशील नारी के जीवन पर एक कहानी पुस्तक “खिरनी की छांह ‘ भी लिखी है.

जेल में अच्छा इंसान बनने के लिए करती हैं प्रेरित

वे बताती हैं कि डकैत परिवारों के साथ समय बिताने के बाद एहसास हुआ कि हर जुर्म के पीछे कोई ना कोई वजह होती है. अगर प्यार और इंसानियत से अपराधियों के साथ पेश आएं तो अपराधियों की जिंदगी भी बदल सकती है. इसलिए अपराधियों के अपराध के दलदल से बाहर निकालने और सही रास्ते पर लाने के लिए प्रीता अक्सर जेल में भी कार्यक्रम करवाती हैं। उन्हें अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करती हैं। इसी का नतीजा है कि कई कुख्यात कैदी भी आज अपराध को पिछली जिंदगी का हिस्सा मानकर नए जीवन की शुरुआत नई और अच्छी सोच के साथ कर चुके हैं. वे कहती हैं कि समाज से अपराध कैसे कम हो इसके लिए सामाजिक और राजनीतिक स्तर भी बदलाव की जरुरत है. 




मेरी बेटियां और दोस्त सबकुछ

प्रीता की दो बेटियां है. जिन्होंने हमेशा उन्हें सपोर्ट किया है. वे कहती हैं कि ईश्वर की शुक्रगुजार हूं की मुझे इतनी प्यारी और समझदार बेटिया दी. जिंदगी के हर मोड़ पर मेरे दोस्तों ने मेरा साथ दिया आज जो कुछ भी हूं अपनी बेटियों और दोस्तों की वजह से हूं. यह लोग हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाते है.

वे एक साल बाद रिटायर हो जाएंगी. इसके बाद उनकी योजना जेल के अनुभव पर एक किताब लिखने की है.  वे चाहती हैं कि वे अपने इस अनुभव को आने वाली पीढ़ी के साथ  बांट सकें कि  एक महिला ने किस तरह से पुरुष जेल में जिंदगी को जीया और अनुभव किया है.  वे कहती हैं यह मेरी ऐसी उपलब्धि है, जो समाज के पास पहुंचनी चाहिए.

(साभार-फोकस भारत)

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