चेन्नई एक्सप्रेस ने दिल्ली की गाड़ी कैसे रोकी?

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संयोगिता कंठ:

वाजपेयी सरकार की डूबती उतराती नैया में इन तीन देवियों की भूमिका बड़ी अहम रही तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता, उत्तरप्रदेश की नेता मायावती और पश्चिम बंगाल की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी. इन तीनों राजनीतिक देवियों से वाजपेयी सरकार का सिरदर्द लगातार बना रहा. सरकार कभी एक की मांगों को निपटाने में लगती तो कभी दूसरे की बातों पर सारा ध्यान लगाना होता और कभी तीसरी सरकार की बातों को अनसुना कर नई मुश्किलें खड़ी करती.




वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर हाल में ही प्रकाशित किताब ‘हार नहीं मानूंगा’ में  विस्तार से लिखा है कि कैसे जयललिता की चेन्नई एक्सप्रेस दिल्ली में वाजपेयी जी की गाड़ी को चलाने में रुकावट बन जाती. 1996 में जब 13 दिन की वाजपेयी सरकार बनी थी, उस वक्त भी जयललिता को साथ लाने की कोशिशें की गई थीं लेकिन जयललिता तब तैयार नहीं हुई. क्योंकि वाजपेयी जी को जयललिता के धुर विरोधी डीएमके के नेता करुणानिधि का क़रीबी माना जाता रहा.




विजय त्रिवेदी लिखते हैं कि 1998 के चुनावों में एआईडीएमके एनडीए में बीजेपी के बाद सबसे बड़ी पार्टी बन गई तो उन्हें लगा कि अब तो उनकी बात मानी जाएगी. जयललिता के करीबी लोगों ने उन्हें बताया कि यदि उस वक्त वाजपेयी सरकार जयललिता के ख़िलाफ़ कुछ आर्थिक मामलों को हटा लेती तो फिर न तो  बाद में उन्हें  जेल जाना पड़ता और न ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ती और जयललिता के हिसाब से ये दोनों नाजायज़ मांग नहीं थी.




तमिलनाडु में उस वक्त डीएमके की सरकार थी और करुणानिधि मुख्यमंत्री थे. वाजपेयी के करुणानिधि से आपातकाल के वक्त से बेहतर संबंध थे और उनके विश्वस्त मुरासोली मारन से भी उनके बेहद अच्छे रिश्ते थे. वाजपेयी आपातकाल के दौरान जब जेल में थे तब करुणानिधि ने जनसंघ के नेताओं की बड़ी मदद की थी. करुणानिधि उस वक्त मुख्यमंत्री थे। जयललिता चाहती थीं कि करुणानिधि सरकार को बर्खास्त किया जाए क्योंकि डीएमके सरकार ने उन्हें बहुत से मामलों में फंसा रखा है. बताया जाता है कि जयललिता तब अपने ऊपर लगे कई आर्थिक मामलों को बंद या ख़त्म कराना चाहती थीं, लेकिन वाजपेयी ने इससे इंकार कर दिया और कहा कि यह मुश्किल है, कानून अपना काम करेगा. इसी कारण जयललिता ने समर्थन की चिट्ठी सौंपने में काफी वक्त लगा दिया. उस समय ये मज़ाक चलता रहा कि चिट्ठी आ रही है… चिट्ठी आने वाली है… चिट्ठी आ गई है. राष्ट्रपति शपथ दिलाने से पहले समर्थन की चिट्ठी चाहते थे और उस चिट्ठी प्रकरण में काफी वक्त भी लग गया.

समर्थन की चिट्ठी देने के बाद भी जयललिता की नाराज़गी और दबाव बना रहा. उन्हें मनाने के लिए वाजपेयी ने कभी जार्ज फर्नाडिस को भेजा तो कभी जसवंत सिंह को.सरकार बने हुए अभी पांच महीने बीते थे कि जयललिता ने वाजपेयी के लिए सिरदर्द बढ़ा दिया था. वाजपेयी ने पहले जार्ज फर्नाडिस को जयललिता को मनाने के लिए भेजा, फिर जसवंत सिंह के साथ प्रमोद महाजन भी गए, लेकिन जयललिता प्रमोद महाजन को देखकर नाराज़ हो गई. वे महाजन को डीएमके नेता मुरासोली मारन का बिज़नेस पार्टनर समझती थी. तीन दिन तक जयललिता को मनाने के लिए बैठकें होती रहीं. वाजपेयी ने कई बार दिल्ली से फ़ोन पर जयललिता से बात की. जयललिता कभी प्रवर्तन निदेशालय के मुखिया एम. के. बेजुबरवा को हटाने की मांग की तो कभी राजस्व सचिव एन.के. सिंह को हटाकर सी.एम. वासदेवन को लगाने की.  वाजपेयी जयललिता की आए दिन की मांगों से तंग आ चुके थे, परेशान थे। जयपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली थी, उसमें फ़ैसला होना था. कागजों पर जयललिता सरकार के साथ थी लेकिन खेल ख़त्म हो गया था.

जसवंत सिंह से भी जयललिता के अच्छे रिश्ते थे. 1999 में स्वामी पार्टी में आए चाय के प्याले में तूफान के बाद जब जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया तो वाजपेयी ने अगले दिन कहा, “आज रात मैं चैन की नींद सो पाया”. वैसे एआईडीएमके के नेताओं का कहना है कि यदि वाजपेयी के बजाय आडवाणी प्रधानमंत्री होते तो शायद समर्थन वापसी की नौबत नहीं आती. गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्जीक्यूटिव चल रही थी. जयललिता के सरकार से समर्थन वापसी की खबरें आ रही थीं. बैठक से पत्रकारों को बाहर कर दिया गया था. बैठक में भी जयललिता की वापसी और उसके बाद के राजनीतिक हालात पर चर्चा हुई. बैठक में जब चाय के लिए ब्रेक हुआ तो वाजपेयी बाहर आए. पत्रकारों ने उनसे शिकाय़ती अंदाज़ में कहा कि यहां चाय क्या, पीने का पानी भी नहीं है. वाजपेयी हंसे, फिर थोडे गंभीर अंदाज़ में आँखों को थोड़ा और बड़ा करते हुए कहा,“क्या करे पानी लायक ही स्थिति हो रही है आजकल”.

जयललिता ने वाजपेयी को कभी सहज नहीं रहने दिया. वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता  ने बताया कि एक बार वे वाजपेयी से मिलने प्रधानमंत्री निवास गए तो देखा उनका मूड खराब था. मेहता ने पूछा,“क्या हुआ ,सर?” वाजपेयी ने जवाब दिया, “नहीं, नहीं,कुछ नहीं. सवेरे-सवेरे जयललिता जी ने फ़ोन कर दिया.“  एक बार1999 में  जयललिता रूठ गईं, क्योंकि उन्हें लगा कि बीजेपी डीएमके के साथ रिश्ते बनाने की कोशिश कर रही है  तो विजय गोयल के घर पर डिनर का आयोजन किया गया था. फिर वाजपेयी और जयललिता, दोनों को एक टेबल पर डिनर के लिए बिठाया. गोयल कहते हैं कि ज़ाहिर है जयललिता का गुस्सा तुरंत उतर गया, कम से कम कुछ दिनों के लिए तो शांत हो ही गईं.

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