COUNSELLING से वे कैसे बचा लेती है FAMILY को टूटने से ?

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Dr Neelam Saxsena
Dr Neelam Saxsena

प्रतिभा ज्योति:

समाजशास्त्री, स्पीरिच्युल थेरेपिस्ट और फैमिली काउंसलर डॉ नीलम सक्सेना परिवार के टूटते रिश्ते को बचाने, पेरेंटस और मां-बाप के बढ़ रही दूरी को कम करने बच्चों में बढ़ रहे दबाव और तनाव को खत्म करने की एक अहम सामाजिक जिम्मेदारी निभा रही हैं. वे 20 सालों से Family Counselling कर रही हैं और इस दौरान उन्होंने सैंकड़ों घरों को टूटने से और लोगों को डिप्रेशन में जाने से बचाया है. बेहद मृदभाषी डॉ नीलम की बात परेशान लोगों के दिलों पर मरहम का काम करता है और वे खुद को बहुत बेहतर महसूस करते हैं.




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डॉ सक्सेना का कहना है कि मैरिज, बच्चे, बुजर्ग, फैमिली, वर्कप्लेस स्ट्रेस और नशे से संबंधित कई मसलों पर लोगों की काउंसलिंग करती हैं. उनका कहना है कि 20 सालों में काउंसलिंग करते यह पाया है कि लोग छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव और डिप्रेशन में आ रहे हैं. बात-बात पर गुस्सा करते हैं और परिवार बिखरने लगता है. ऐसे में काउंसलिंग करके परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है.




वे खास तौर पर Spiritual Therapy करती हैं जिससे लोग अपनी खुद से रुबरु होते हैं और अपनी समस्या को सुलझाने की कोशिश करते हैं. उनके पास बच्चे, युवा, बुजर्ग, महिलाएं, नौकरीपेशा, हाऊस वाइफ, स्टूडेंट, पति-पत्नी, माता-पिता हर तरह के पेशेंट आते हैं. बेहद कम समय में पेशेंट की समस्या का हल निकालने के कारण लोग उनके मुरीद है. ऐसे ही एक पेशेंट का कहना है कि मैं वर्कप्लेस पर अपने बॉस के बिहेवियर को लेकर बहुत परेशान रहती थी और जब मैं डॉ सक्सेना से मिली तो उन्होंने मुझे ऐसे उपाय बताए जिससे मेरा तनाव छू मंतर हो गया. उनका कहना है कि यदि हम किसी समस्या से घिरे हों तो काउंसलिंग करवाने में कोई समस्या नहीं. यह आपको आराम और राहत पहुंचाता है.

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डॉ नीलम बताती हैं कि अधिकांश घरों में पेरेटंस और बच्चों के बीच तनाव होता है. ऐसे में काउसलिंग उनकी सहायता कर सकता है. उनके मुताबिक ज्यादतर समस्या जेनरेशन गैप के कारण होती है. बच्चे हमसे जो कहते हैं उसे मानना चाहिए इससे यह गैप खत्म हो जाएगा. उनका मानना है कि पेरेंटस को अपने एक्सपिरियंस अपने बच्चों के साथ शेयर करना चाहिए, उन पर थोपना नहीं चाहिए. इससे पेरेंटस और बच्चों के रिश्ते अच्छे रहते हैं.  




वे कहती हैं कि महिलाएं अपने अधिकारों से अवेयर नहीं है. यही हमारी सबसे बड़ी कमी है. सश्क्तिकरण का मतलब किसी युद्ध या जंग के लिए तैयार करना नहीं है बल्कि खुद को समर्थ बनाना है. हर महिला के अंदर कोई न कोई खूबी छिपी होती है. वे महिलाओं के अंदर इस तरह का आत्ममविश्वास पैदा करती हैं  जो कल तक अपनी खूबियों को नहीं जानती थी वे उसे पहचाने लगे. वे महिलाओं को सीमित बजट में घर चलाने और अपने हुनर को नुखारने का नुस्खा भी बताती हैं. 

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