वे कैसे OLD कपड़ों में फूंक देती है जान?

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प्रिया शांडिल्य:

शादी है तो साड़ी, लहंगा, कुर्ता, शेरवानी, पार्टी है तो  ड्रेस, टी-शर्ट, पूजा है तो धोती, सलवार. हर मौके पर हम अलग अलग तरह के कपड़ों से खुद का श्रृंगार करना पसंद करते हैं. हमारी वार्डरॉब कपड़ो से भर जाती है और घर में कपड़ो की दुकान सी लग जाती है. ऐसे में हम Old कपड़ो को या तो फ़ेंक देते हैं या रद्दी वाले को दे देते हैं. मगर इन कपड़ो में कई ऐसे भी कपड़े होते हैं जिनसे हमारा लगाव कुछ ख़ास होता है. वे हमारे सुनहरे पलों की याद के तौर पर हमारे अलमारी में बंद रहती है. मगर एक न एक दिन इन्हें बाहर तो करना ही है ना?

इन्हीं सुनहरे यादों को अपने पास बनाये रखने और उन्हें रिसाइक्लिंग करके जरुरत की दूसरी चीजें बनाने के लिए आयशा और मनीषा देसाई ने Cornucopia नाम की कंपनी बनाई और अपने बिज़नेस की शुरुआत की. उन्होंने पुराने कपड़ों को इकठ्ठा किया और उन्हें दे डाला एक नया और सुंदर रूप. पुराने कपड़ों को मिलकर दूसरी चीजें जैसे की चद्दर, रज़ाई, बच्चों के चादर आदि बनाना शुरू किया. साड़ी, सूट, टी-शर्ट, बेडशीट, परदे आदि सभी पुराने कपड़ों का सही उपयोग किया और इनको फेंकने की बजाय इन्हें नया आकार दिया जो कि घर पर इस्तेमाल भी किया जा सके.देसाई बहनों ने cornucopia कि शुरुआत भले ही जनवरी 2017 में की लेकिन उन्होंने अपने इस बिज़नेस की नींव आठ साल पहले ही रख दी थी. घर पर ही उन्होंने पुराने कपड़ो को रिसाइकल करना शुरू कर दिया था. सामान पुराने होते थे मगर उनका अंतिम परिणाम बिलकुल नया और उम्दा रहता है. पुराने कपड़ो को काटकर, दूसरे कपड़ों से जोड़कर एक बेहतरीन प्रोडक्ट सामने आता था. उनके पैचवर्क और डिज़ाइन्स एक बेहतरीन कलाकारी का नमूना रहता है. बेहतर काम को देखते हुए सबसे पहले तो रिश्तेदारों ने आर्डर देना शुरू किया फिर पास पड़ोस के लोगों ने और धीरे धीरे उनका काम जमने लगा. लोगों को उनकी कलाकारी पसंद आयी. आज महज पांच लोगों की टीम को जोड़कर महीने में 30 से 40 ऑर्डर्स पूरे करती हैं. फिलहाल कॉर्नकोपिया की सुविधा अभी केवल मुंबई, पुणे, दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम तक सीमित है लेकिन उनकी योजना   इसे आगे बढ़ाने की है.आयशा और मनीषा ने कपड़ों के रीसाइक्लिंग से पर्यावरण और इंसान दोनों को फायदा पहुंचाया है. अब लोग कपड़ों को फेंकने की बजाय इनका सही इस्तेमाल कर सकते हैं. कपड़ों को लेकर स्थिरता और लम्बे समय तक इस्तेमाल की जागरुकता लोगों में आएगी. कोर्नकॉपिया के माध्यम से देसाई बहनों ने बाजार में इको-मार्केट की स्थापना की है. देसाई बहने अपने काम से खुश हैं और उनका कहना है कि इस बिज़नेस से उन्होंने वेस्ट मैनेजमेंट कि तरफ अपना कदम बढ़ाया है. उनकी कंपनी में कई और महिलाएं करने लगी हैं. तो आपको भी यदि अपने पुराने कपड़ों से जुड़ी यादों को ताजा रखना है तो उसके कंबल, चादर और सोफाकवर बनाकर उसे नया रुप दे सकते हैं. हां इसके बदले आपको चुकाना पड़ेगा 2000 से लेकर 6000 हजार रुपए तक.

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