क्यों सूखने लगी नैनी झील?

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नैनी झील nainital
नैनी झील nainital

पर्यावरण दिवस पर विशेष

दिनेश मानसेरा:

क्या इस बार आप छुट्टियों में नैनीताल जाने के लिए सोच रहे हैं? हर टूरिस्ट की तरह आप भी नैनी झील जरुर जाएंगे. चिन्ता की बात यह है कि यह झील आपको सूखी नजर आएगी. जो स्थितियां पहले जून में दिखती थी वह इस बार दिसम्बर-अप्रैल में ही दिखने लगी थी. झील गेज में नैनी झील का जल स्तर 17 फीट नीचे पहुंच गया है. पूरा झील बदला सा लग रहा है. झील में विशाल डेल्टा उभर गए है. पानी की जगह रेतीले मैदान दिखने लगे हैं.




नैनी झील का सीधा असर टूरिज्म इंडस्ट्री से जुड़े उन लोगों की जेब पर पड़ता है जो यहां पर्यटकों को लेकर आते हैं. मौसम के तेवर के कारण पिछले दो सालों से झील बेहद प्रभावित हो चुकी है. नैनी झील 40 प्रतिशत भूमिगत व 60 प्रतिशत वर्षा जल से रिचार्ज होती है. विंटर रेन झील के लिए जरूरी मानी गई है. नैनी झील को बरसात में तो पर्याप्त पानी मिला लेकिन इसे शून्य स्तर से झील गेज में 10 फीट तक ही भरा गया, जबकि दो फीट छोड़ दिया गया. इस तरह झील इस बार 12 फीट पूरी नहीं भरी गई. झील अब तक छह फीट नीचे आ गई है. हालत यह है कि नैनी झील हर रोज इंचों में घट रही है.




यूजीसी के भूवैज्ञानिक डा. बहादुर सिंह कोटलिया का कहना है कि नैनी झील सर्दियों की वर्षा व बर्फबारी पर अधिक निर्भर है. मानसूनी वर्षा से जहां झील को 12 फीट तक भरा जाता है वहीं सर्दियों की वर्षा और बर्फवारी के कारण झील के लिए जरूरी भूमिगत जल का संतुलन बना रहता है. बीते साल बर्फवारी कम होने से भूमिगत जल में विपरित प्रभाव पड़ा है. झील का स्तर चिन्ता जनक स्थिति में नीचे गिरा है. हालांकि गुफा लिंगों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन का अध्ययन कर रहे कोटलिया का कहना है कि इस बार मध्य हिमालयी क्षेत्र में शीतकाल में अच्छी वर्षा व बर्फवारी होने की पूरी उम्मीद है.




नगर की पेयजल आपूर्ति के लिए 11 नलकूपों से रोजाना 14 लाख लीटर पानी झील के जलागम क्षेत्रों से खींचे जा रहे है जिसका सीधा प्रभाव झील में पड़ रहा है. इस पर अब नियंत्रण करने की जरूरत महसूस की जा रही है. पर्यावरणविद् प्रो. अजय रावत का कहना है कि जलागम क्षेत्रों से लगातार पानी खींच कर जलापूर्ति की जा रही है उस पर अब नियंत्रण किया जाना जरूरी है. इसके लिए रोस्टर से पानी वितरित किया जाना जरूरी है. वहीं नैनीताल में पानी की बर्वादी को भी रोका जाना जरूरी है.

लगातार वर्षा के बाद झील का लबालब न होना अत्याधिक चिन्ताजनक है. इससे अधिक चिंता की बात जलागम क्षेत्रों से 19 लाख लीटर पानी का दोहन किया जाना है. नगर में बिछाए गए पाईप लाईनों से लगातार पानी का रिसाव भी चिंता का कारण है. घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में पानी की बर्बादी भी बड़ी मात्रा में की जाती है, जिसका प्रभाव झील पर पड़ रहा है. इस साल के अन्त तक भारी वर्षा और नए वर्ष में भारी हिमपात ही झील का सन्तुलन बना सकते हैं.

(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार है)