PREETAM, लगता है तुम अमृता बना कर चले गए

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Rose inside book
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नम्रता हैदराबाद:

किताब को खोला तो गुलज़ार साहेब की शायरी की तरह देसी गुलाब के सूखे फूल की पंखुंरिया पन्ने पर चिपकी हुई थीं. महक भी उड़ सी गई थी लेकिन उसकी पुरानी खुशबू एक ही पल में पुराने दिनों की तरफ ले गई. चेहरे पर चुपके से मुस्कराहट तो आई लेकिन अचानक स्वाद में फीकापन सा महसूस हुआ .




अमृता प्रीतम का यह उपन्यास या यूं कहे कि उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट रोहन ने ही लाकर दिया था मुझे. मेरी पसंद की कथाकार अमृता प्रीतम ,शायद इसीलिए रोहन भी मुझे मेरे नाम के बजाय अमृता कहता था. प्यार भी बहुत करता था और मैं तो दिलो जान से कुर्बान. वैसे भी रोहन पर कालेज की ज़्यादातर लड़कियां मरती थीं. खूबसूरत, लंबे कद और आकर्षक नाक नक्श वाला रोहन गाता भी बहुत अच्छा था. कालेज का कोई भी फंक्शन उसके गाने के बिना पूरा ही नहीं होता, लेकिन उसे मेरी कविताएं पसंद आ गई थीं और शायद उसी बहाने मैं भी.




 

हम दोनों अक्सर कॉलेज के ओपन एयर शियेटर में चले जाते और शाम को यूं ही घंटों गुज़ार देते. कई बार वह मेरी कविताओं को सुरों में ढ़ालने की कोशिश करता. मैं मन ही मन इतराती रहती अपनी किस्मत पर. दूसरी लड़कियां भी मुझसे रश्क करतीं और किसी ना किसी बहाने रोहन से मुलाकात करने की कोशिश करती रहतीं. मुझे रोहन पर पूरा भरोसा था और अपने प्यार पर भी .कोई औपचारिकता हम दोनों के बीच नहीं थीं. एक दो-बार एक दूसरे के बदन की महक और गर्माहट को भी महससू कर लिया था. उसे मेरा यौवन और मुझे उसकी गर्माहट का पागलपन था. प्यार परवान चढ़ रहा था. 

कॉलेज में वैलेंटाइन डे करीब आने के साथ रुमानियत बढ़ने लगी थी . हर कोई अपने अपने प्यार के लिए कुछ ना कुछ गिफ्ट खरीद रहा था या कोई और प्लान बना रहा था. उस 14 फरवरी को यानी वैंलेटाइन डे पर मैं अपनी सहेली रश्मि के साथ बतिया रही थी तभी रोहन करीब आते दिखा तो रश्मि दौड़कर उसके पास पहुंच गईं. रोहन ने अपने पीछे हाथों में खूबसूरत गुलाब का बुके ले रखा था.




रश्मि ने तकरीबन छीनते हुए उस पर कब्ज़ा जमा लिया. रोहन और मैं देखते ही रह गए. रश्मि और मैं दोनों हॉस्टल में अगल बगल के कमरे में रहते थे. मैंने कुछ कहा नहीं उसे. रश्मि बुके लेकर दौड़ती चली गई , दूसरी लड़कियों को दिखाने के लिए. रोहन झेंप सा गया. थोड़ी देर में रोहन एक देशी गुलाब के फूल के साथ आया. कालेज कैंपस में बने शिव मंदिर से शायद पूजा का गुलाब का फूल वो उठा लाया था, उसने वो गुलाब देकर मेरे माथे को चूम लिया, मानो मेरा तन बदन उसके प्यार से महक गया.

हॉस्टल आकर मैंने वह गुलाब किताब में रख दिया. तीन दिन बाद देखा रश्मि के कमरे के बाहर वह बुके कूड़ेदान में पड़ा था. कॉलेज की छुट्टियॉं हो गई थीं और प्लेसमेंट में मैं बंगलौर आ गई तो रोहन को लखनऊ में जॉब मिली थी. कुछ दिनों तक फोन पर बातचीत चलती रही, फिर कुछ दिनों बाद कार्ड कूरियर से आया. शादी का कार्ड, नाम लिखा था रोहन-रश्मि. आंखों के कोने नम हो गए …

खुद फिर शादी करने का मन बना ही नहीं, अपने लिखने को ही मैंने अपना काम बना लिया और आज वैंलेटाइन डे पर लड़कियों के एक कॉलेज में प्यार पर कुछ चर्चा में हिस्सा लेने जाना था तो लगा कि  प्यार को समझने के लिए अमृता प्रीतम से ज़्यादा बेहतर क्या हो सकता है. किताब को बुकशेल्फ से उतारा, पहले पन्ने पर लिखा था- मेरी अमृता. रोहन और किताब में वो सूखे देसी गुलाब की पंखुरियां .. तेज़ हवा का झोंका आया ,कुछ पंखुंरिया उड़ने लगीं त ना जाने क्यूं उन्हें फिर से संभालने को हुईं..लेकिन वो कमरे की बालकनी से उतरती हुई दूर चली गईं थी मेरी पहुंच से दूर.

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