#MyFirstBlood-लगातार ब्लीडिंग से सहम गई थी, लगा शायद कोई SERIOUS ILLNESS हो गई है

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Dr. Santwana Srikant
Dr. Santwana Srikant

#MyFirstBlood की 16वीं कड़ी में आज पढ़िए मध्यप्रदेश के रीवा की डॉ सांत्वना श्रीकांत के अनुभव. वे बताती हैं कि जब पहली बार पीरियड हुआ तो लगातार ब्लड देखकर उन्हें लगा कि शायद Serious Illness हो गई है. वे घबरा गईं थीं, लेकिन जब अब खुद डॉक्टर बन गई हैं तो वैज्ञानिक तरीके से इस बात को दूसरों को समझाती हैं. 




डॉ सांत्वना श्रीकांत:

मुहीम के आग्रह पर अपने पहले पीरियड पर लिखने ही जा रही थी कि मेरी नजर सोनम कपूर के एक बयान पर पड़ गई. आश्चर्य की बात है कि बालीवुड की यह युवा अभिनेत्री भी मासिक धर्म को लेकर समाज और परिवार की पुरानी मान्यताओं से बच नहीं पाई.




सेनेटरी नैपकिन पर बन रही फिल्म पैडमैन की इस अदाकारा ने बताया कि पीरियड के दौरान उनकी दादी मंदिर जाने से रोकती थीं. उन्हें किचन में जाने से भी मना किया गया.

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मैं सोचती हूं कि जब मुंबई में पली-बढ़ी यह युवती रूढ़िवादी मानसिकता की शिकार हो गई तो गांवों और कस्बों में रह रही लड़कियों के साथ किस कदर अछूत जैसा बर्ताव किया जाता होगा? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.




आज पीरियड को लेकर भारतीय समाज में जागरूकता आ रही है. मुहीम और वुमनिया जैसी संस्थाएं जागरूकता अभियान चलाती हैं, तो एक उम्मीद बंधती है कि इस मुद्दे पर झिझक दूर होगी.

सबसे अच्छी बात है कि उदारवादी पुरुष उन चार दिनों में स्त्रियों का ख्याल रख रहे हैं. वे सामाजिक संस्थाओं से जुड़ कर अपना योगदान दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी वे सजग हैं. मगर जागरूकता की यह रोशनी गांवों-कस्बों में फैले अंधियारे को दूर करे तो बात बने.

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जाहिर है कि अब चुप्पी तोड़ने का समय आ गया है. पीरियड को लेकर टैबू मेरे मन में भी था. याद है वह दिन, जब मैंने अपना फर्स्ट ब्लड देखा. तब मैं नौंवी कक्षा में पढ़ती थी. उन दिनों मेरी वार्षिक परीक्षाएं चल रही थीं.

वो 20 दिन मेरे लिए भयावह थे. लगातार ब्लड आ रहा था. मैं एकदम सहम गई थी। मन में एक खौफ बैठ गया कि शायद मुझे कोई Serious Illness हो गई है.

मां से पूछते हुए संकोच हो रहा था कि उन्हें क्या बताऊं? सेनेटरी पैड कैसे इस्तेमाल करना है, यह पता नहीं था. जहां-तहां ब्लड लग जाता था. तब घर में चादर देकर कहा गया कि इसी पर बैठा करो.

हिदायत मिली कि किसी पुरुष के सामने मत जाना. उन दिनों कमजोरी रहने लगी. देखरेख न होने और खाने-पीने में लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि एक दिन स्कूल में चक्कर खाकर गिर पड़ी. घर में किसी को समझ में नहीं आया कि मुझे हुआ क्या है?

ज्यादा ब्लड निकल से मुझे कमजोरी हो गईथी. उन दिनों साफ-सफाई की कमी भी एक समस्या थी. आज की तरह बार-बार पैड बदलने की सुविधा भी नहीं थी. कॉटन के टुकड़े से काम चलाती थी. लगातार ब्लीडिंग से एनिमिया हो सकता है, यह मुझे पता नहीं था.

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आज जबकि मैं खुद डॉक्टर हूं तो हाईजिन से लेकर तमाम बातें लड़कियों को बताती हूं. अब समझ में आता है कि उन चार दिनों को भी सहज और तनावमुक्त बनाया जा सकता था? पौष्टिक भोजन से शरीर में आयरन की कमी दूर की जा सकती थी.

पर उस वक्त किशोर उम्र में इतनी कहां समझ थी मुझमें. आज भी देखती हूं कि लड़कियां शारीरिक कमजोरी की उपेक्षा करती हैं. पौष्टिक भोजन करने से कतराती हैं. नतीजतन वे एनीमिया का शिकार हो जाती हैं.

कोई दो राय नहीं कि कोई 15 साल पहले लड़कियों में जो झिझक थी, वह कम हुई है. मैं खुद कुछ साल पहले तक केमिस्ट की दुकान से सेनेटरी नैपकिन खरीदते हुए संकोच करती थी. अब ऐसा नहीं है.

आज जब दुकानदार काले रंग के थैले में पैड डाल कर देता है, तो सोचती हूं कि आखिर इसे छिपा कर क्यों दिया जा रहा है? इसमें शर्म कैसी? हमें इसी संकोच को खत्म करना है. समाज को बताना है कि मासिक धर्म के दौरान कोई लड़की अछूत नहीं हो जाती.

सच तो यह है कि मासिक चक्र शुरू होते ही कोई भी लड़की संपूर्ण नारी बनने की ओर अग्रसर होती है. उसे दरकिनार करने का मतलब है आधी दुनिया की उस रचनात्मक भूमिका की उपेक्षा, जिससे यह पूरी दुनिया बनती है.

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यह किसी को नहीं भूलना चाहिए कि नारी-पुरुष का संबंध भी उसी लाल रंग से साकार होता है, जो हमारी परंपरा में शुभता का प्रतीक है. अंत में मुझे अपनी कविता की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं, जो मेरी इस बात को सार्थक करती हैं-

कोने में पड़े रह कर-
अछूत भी कहलाई.
तिमिर जो दूर तक है,
हर मास ही तो यह संघर्ष
स्त्री होने का.
लाल रंग जो तुम्हें देता पौरुष,
तिलक लगा लाल, कहलाते वीर.
मिट्टी होती कीचड़,
होती लाल- फिर सृजन प्रतीक.
मैंने तो
पूरी सृष्टि रची है,
अपने इस लाल रंग से,
नौ माह कोख में रख,
किया समर्पित तुम्हें.

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