SINGLE MOTHER के लिए क्यों मुश्किलें है जमाने में?

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मंजुला श्रीवास्तव:

(शिक्षिका, खेतान पब्लिक स्कूल, साहिबाबाद)

बच्चे को जन्म तो हम देते हैं लेकिन उसे बड़ा करके पाल-पोसकर बड़ा करके समाज को देते हैं. यदि बच्चे में अच्छे संस्कार का निर्माण नहीं किया तो कहीं न कहीं इसके लिए पेरेंटस ही जिम्मेवार होते हैं. लेकिन Single Mother  या Single Parent के लिए बच्चे का लालन-पालन वाकई एक बड़ी चुनौती होती है. हालांकि यदि सिंगल मदर बच्चे की अच्छी परवरिश को एक संकल्प के तौर पर ले तो उसमें ताकत आ जाती है. यही ताकत मुझमें आई थी, जब मुझे अकेले ही अपने बेटे को पालना पड़ा. सिंगल मदर मदर होने के कारण लोग बहाने से क़रीब आने की कोशिश करते थे, लेकिन मैंने मनोवैज्ञानिक तरीके से इस चीजों को हैंडल किया.  




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मेरी ससुराल उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में है. मैं जब 22 साल की थी और मेरा बेटा पांच महीने का था तभी मेरे पति की दुर्घटना में मृत्यु हो गई. पति की मृत्यु के बाद मेरे ससुराल वालों का व्यवहार बदल गया. मेरे सामने हम दोनों के भविष्य का सवाल खड़ा हो गया. मेरे पिताजी मुझे घर ले आए. मेरा मायका भी वहीं था. मैंने अपनी पढ़ाई फिर से शुरु की. मैंने बीएड किया. पहली नौकरी गाजीपुर के एक इंटर गर्ल्स कॉलेज में पढ़ाना शुरु किया. उसके बाद बनारस आ गई. यहां एक स्कूल में वार्डन और टीचर की नौकरी  की. वहां मुझे रहने के लिए जगह भी मिला. यहां मैंने शर्त रखी कि बच्चा मेरे साथ ही रहेगा. उसके बाद मैंने बनारस में ही SOS Children’s Village’s Of India में टीचर की नौकरी थी.




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यहां भी मुझे रहने को जगह मिली, लेकिन मैं अपने बच्चे पर पूरा ध्यान नहीं दे पाती थी. वह बीमार रहने लगा. तो मेरे पेरेंटस उसे अपने साथ ले गए. उन्होंने मुझे बहुत सपोर्ट किया. लेकिन बेटे के पास में नहीं रहने पर दो-तीन सालों में मेरा खाना बनाना और खाना छूट गया. यह सोचकर पापा ने मेरे बेटे को फिर मेरे पास छोड़ दिया. मैं नहीं चाहती थी कि मेरा बच्चा सहारा ढूंढने लगे. उसे हमेशा दूसरे ब्रांच में रखा. कक्षा 3-4 कक्षा में था तो 22 किलोमीटर दूर स्कूल में उसका एडमिशन करा दिया.




मैं उसे सहजता से जीना सीखा रही थी. बच्चे में समझ विकसित करने के लिए उसे अपने-आप फैसला लेने का विश्वास पैदा किया. मैं उसके व्यक्तित्व विकास पर जोर दे रही थी. मैंने इन बातों का मैं ध्यान रखा कि मैं चाहे कितनी भी देर से आऊं कि मैं उसे खाना जरुर खिलाती थी और उसकी बातें सुनने की आदत डाली. चाहे मैं कितना भी व्यस्त रहूं मैं उसकी हर बात सुनती थी. उसकी जब गर्लफ्रेंड मिली तो उसने सबसे पहले मुझे बताया. मैंने बचपन से यह कोशिश की थी कि बच्चे को अपना स्पेस मिले, उसे अपना फैसला लेने की इजाजत मिलनी चाहिए. सिंगल मदर के तौर पर मैंने चाहे जो भी दिक्कतें उठाई हों लेकिन मुझे अपने बेटे और अपनी परवरिश पर गर्व है.        

 

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