MENSTRUAL HYGIENE DAY- अब भी कई महिलाएं घास-फूस, गोबर, मिट्टी, राख या पुराने कपड़ों के इस्तेमाल के लिए मजबूर

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Menstrual Hygiene Day
Menstrual Hygiene Day

प्रतिभा ज्योति:

आज Menstrual Hygiene Day है और इसलिए आज इस पर चर्चा जरुरी है. पहली बार 28 मई 2014 को इस दिन को मनाया गया और अब यह सिलसिला चल पड़ा है जिससे कि पीरियड के दौरान स्वच्छता रखने को लेकर जागरुकता फैलाई जा सके.

हम सब जानते हैं कि टीएनएज में लड़कियों का Period होना बेहद आवश्यक और प्राकृतिक है, लेकिन भारत में इसे लेकर कई तरह की भ्रांतियां है.

टीएनएज लड़कियों को इस समय होने वाले बदलाव को सहजता से स्वीकार करना सिखाने और उनकी साफ-सफाई का ध्यान रखने को लेकर कई सवाल हैं.

वैसे आधुनिक शिक्षा पद्धति के कारण अब स्कूलों में बच्चियों को छठी कक्षा से ही इसके लिए जागरुक बनाया जा रहा है लेकिन अब भी Periods में महिलाओं के सेहत और स्वास्थय को लेकर स्थिति बेहद खराब है खासकर ग्रामीण इलाकों में.




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1-अब भी कई स्कूल में टॉयलेट्स नहीं है, टॉयलेट्स हैं भी तो 200-300 लड़कियों पर एक या दो..ऐसे में गंदगी के कारण ज्यादतर लड़कियां इन दिनों में खासतौर पर टॉयलेट में जाना पसंद नहीं करतीं इसलिए वे स्कूल नहीं आती.

एक रिपोर्ट के मुताबिक इन दिनों पांच में से एक लड़की स्कूल नहीं जाती. इसकी एक वजह यह भी है कि लड़कियों को कपड़े में दाग लग जाने और लोगों का मजाक बनाने का डर सबसे ज्यादा सताता है.




2-लड़कियों और महिलाओं के साथ दूसरी समस्या सैनटरी पैड को लेकर जागरुकता की कमी है. गांवों में अब भी सैनटरी पैड की पहुंच नहीं हुई है. इसकी सबसे बड़ी वजह सैनटरी पैड का महंगा होना है और इसे बनाने वाली कंपनियां बढ़ी कीमत के कारण अमूमन ग्रामीण इलाकों में इसका प्रचार भी नहीं करती.

3-‘गूंज’ संस्था ने महसूस किया कि कई महिलाओं को जब रोजाना पहनने के कपड़े नसीब नहीं होते तो वे पैड का कैसे इस्तेमाल करेंगी. इसलिए वे घास-फूस, गोबर, मिट्टी, राख या पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती है.

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कपड़ा भी वही होता है जिसे वे हर महीने Periods के बाद धो कर रख लेती हैं. इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया जाता कि इससे महिलाओं की सेहत को कितना नुकसान पहुंचता है.

डब्लूएचओ के मुताबिक गर्भाशय के कैंसर के 27 फीसदी महिलाएं भारत की होती हैं और पीरियड्स में साफ-सफाई की कमी इसकी सबसे बड़ी वजह है.




4-एक सैनटरी पैड बनाने वाली कंपनी ने एक सर्वे में पाया में शहरी इलाकों में पैड खरीदते समय दुकानदार इसे काली पॉलीथीन में ग्राहक को देते हैं, जिससे किसी की नजर पैड के पैकेट पर नहीं पड़े.

ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि पीरियड को शर्म के साथ जोड़ कर देखा जाता है. पति को छोड़कर परिवार के किसी दूसरे पुरुष सदस्य के हाथ से इसे मंगाना महिला की बेशर्मी से जोड़ कर देखा जाता है.

5-कई घरों में Periods होने पर महिलाओं को किचन और पूजा घर और मंदिर में जाने की इजाजत नहीं होती. उन्हें अचार छूने से मना किया जाता है. माना जाता है कि इस दौरान महिलाएं अपवित्र हो जाती हैं.

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जबकि पीरियड होना कोई छूत की बीमारी नहीं है लेकिन अब भी कई लोगों के मन से यह भ्रांति निकलती नहीं. जबकि इस दौरान होने वाले छूआछूत का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.

6-घरों में इस मामले पर खुलकर कोई बात नहीं की जाती. बेटी को यदि पीरियड का दर्द हो रहा हो तो भाई और पिता से इस बात को छुपाया जाता है क्योंकि महिलाओं के स्वास्थय खासतौर पर पीरियड्स, गर्भधारण या महिलाओं की और कोई शारीरिक समस्या पर आमतौर पर घरों में चुप्पी ही रहती है.

जरुरी है कि पीरियड को लेकर शर्म और झिझक बस अब खत्म किया जाए. यदि आपको अपनी घर की महिलाओं से प्यार है तो उनके स्वास्थय और सेहत का ख्याल रखिए, पीरियड और प्रेग्नेंसी में खास तौर पर..

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