“lipstick Under My Burkha” के वो दस सीन्स, क्या आप देखना चाहेंगें ?

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lipstick under my burkha
lipstick under my burkha

रश्मि शर्मा:

प्रकाश झा और एकता  कपूर की फ़िल्म ‘Lipstick Under My Burkha’ आखिरकार सिनेमाघरों में पहुंच गई है,. फिल्म समीक्ष फिल्म की तारीफ हो रही है.   फिल्म के आने से पहले ही काफी हंगामा हुआ. प्रोड्यूसर्स और सेंसर बोर्ड के बीच चले फिल्म की रीलिज को लेकर विवाद रहा. ट्रिब्यूनल के आदेश पर ‘The Central Board of Film Certification’ ने इसे “ A” certificate के साथ रिलीज करने दी.

फ़िल्म की कहानी और निर्देशन अलंकृता श्रीवास्तव का है. ज़ाहिर है ज़्यादातर लोगों की दिलचस्पी अब इसमें बढ़ गई है कि फ़िल्म में ऐसा क्या है कि सेंसर बोर्ड इसे A सर्टीफिकेट के साथ भी जारी नहीं करना चाहता था. ये फ़िल्म भोपाल शहर की चार महिलाओं के Secret life  की कहानी है. यह फिल्म महिलाओं के  सीक्रेट फेन्टेसीज़ खोलती है, उनकी Disers के बारे में बताती है. तो क्या इसका मतलब ये माना जाए कि बतौर सेंसर बोर्ड महिलाओं को इसमें से कुछ भी करने की इजाज़त नहीं .




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फ़िल्म के कुछ सीन्स पर नज़र डालिए-

एक 55 साल की महिला अपने स्विमिंग कोच के साथ Relation बनाना चाहती है. डर्टी बुक्स पढ़ती है.

55 साल की महिला अपने लिए कलरफुल एक्साइटिंग Bra पसंद पसंद कर रही है और अंडरआर्म्स को क्लीन करवा रही है.

एक लड़की ज़बरदस्ती शादी का विरोध कर रही है, लेकिन अपने फ्रेंड के साथ सेक्स करती दिखती है. कुछ पोर्न सीन्स  भी हैं फ़िल्म में.

एक लड़की ट्रेन में और बाहर कुतुबमीनार के सामने अपने किसिंग सीन्स दे रही है. फिल्म में काफी किसिंग सीन्स हैं.

एक लड़की का सवाल क्या अपने desire के लिए सुहागरात तक का इंतज़ार करें. सेक्सुअल इंटीमेसी के कई सीन्स हैं.




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एक बीवी नहीं चाहती कि वो सिर्फ़ बच्चे पैदा करने की मशीन बन जाए, इसलिए वो कंडोम की बात करती है .

मेडिकल स्टोर पर कंडोम खरीदने के लिए वो कहती है कि “ टोपी ’”चाहिए और साथ में खड़े उसके बच्चे भी टोपी मांगने की ज़िद करते हैं.

एक बाथरूम सीन में अकेली महिला न्यूड नहा रही है.

एक कालेज गर्ल अपने सपनों को छिप कर पूरा करना चाहती है, बैंड में शामिल होती है .

लड़की सवाल करती है कि जींस पहनने और  लिपस्टिक लगाने से क्या हो जाएगा ?

फ़िल्म के ट्रेलर में कहा गया है – “It takes balls to be a woman”




क्या सेंसर बोर्ड सोचता है कि महिला प्रधान फिल्में सिर्फ महिलाओं पर अत्याचार, बलात्कार और उनके संघर्ष और प्रतिशोध पर ही बनी होनी चाहिए. फिल्म अगर महिलाओं की यौन इच्छाओं यानी सैक्सुअल डिजायर्स पर आधारित है तो उसमें क्या परेशानी है ,क्या ये सिर्फ मर्दों के एकाधिकार का क्षेत्र है? महिलाओं को फिल्मों में Sex Object बनाने पर सेंसर बोर्ड अक्सर परेशान नहीं होता .

और ट्रेलर में लड़की का आखिरी सवाल है आपसे कि – तुम लड़कियों की आज़ादी से इतना डरते क्यों हो ?

 क्या ये वाज़िब सवाल नहीं ?