DASTAN-E-JAUHAR- ‘रानियों के जौहर की परंपरा’ पर क्या कहते हैं इतिहास के पन्ने?

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डॉ कायनात क़ाज़ी:

ट्रैवलर, ब्लॉगर, फोटोग्राफर:

रानी पद्मावती का नाम आए और Jauhar (जौहर) की बात न हो ऐसा तो हो ही नही सकता. जौहर की शुरुआत कब हुई इसके प्रामाणिक साक्ष्य नही मिलते लेकिन कालांतर मे यह विकसित हुआ ऐसा कहा जा सकता है.




वैसे यह क़िस्सा भी बड़ा अनोखा है. राजस्थान की धरती ही ऐसी है जहां कण- कण में वीरता की निशानियां मिलती हैं. अतीत के पन्ने पलट कर देखें तो राजा रजवाड़ों के बीच युद्ध के मुख्य कारणों मे से एक कारण होता था राजाओं के ज़नानख़ाने मे रहने वाली अप्रतिम सौंदर्य की मालकिन रानियां.

इसलिए परदा प्रथा अपने चरम पर था. रानियां और राजकुमारियां कड़े पर्दों मे रखी जाती थीं. फिर भी उनके सौंदर्य की चर्चा जंगल मे आग की तरह फैल जाती थी. दुश्मन राजा को जब यह भनक लगती कि अमुख राजा की रानी बहुत सुंदर है तो वह पूरे लाव लश्कर के साथ उस राज्य पर चढ़ाई कर देता.




भीषण युद्ध होता सैंकड़ों लोग मारे जाते. जीत जाने पर जब हमलावर राजा, रानी को हासिल करने ज़नानख़ाने तक पहुंचता, उससे पहले ही रानियां ज़हर खा कर अपने प्राण त्याग देती. इतने खूनी संघर्ष के बाद जब हमलावर राजा रानी को मरा हुआ पाता तो गुस्से से पागल हो जाता और रानी के मृत शरीर के साथ क्रूरता करता.

क्रोध की अंधी ज्वाला में पागल आक्रमणकारी राजा उनके मृत शरीर के  नाक कान काट डालता. अपने शरीर के साथ भी ऐसा आचरण ना हो इसके लिए रानियों ने उसे भी स्वाहा करने का रास्ता निकाला और अग्नि कुंड मे जलना श्रेष्ठकर पाया.




जिससे नीच हमलावर राजा को उनके मृत शरीर भी हासिल ना हो सके, मिले तो सिर्फ़ राख. इस तरह जौहर अस्तित्व मे आया. अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नज़र से बचने के लिए रानी पद्मावती ने 16 हज़ार राजपूत वीरांगनाओं के साथ चित्तौड़ के क़िले मे 1305 ई० में  जौहर किया. आज भी इस स्थान के नज़दीक पहुंच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

जौहर परंपरा से जुड़े कई किस्से हमें राजस्थान में सुनने को मिलते हैं. जौहर की दास्तान यहां के लोग बताते हैं कि जौहर करना कोई आसान काम नही है. अपने जीवित शरीर को अग्निकुण्ड के हवाले करने के लिए जिगर चाहिए. राजपूत धरती की वीरांगना रानियों की दासियां भी कम वीर नही होती थी. पर ज़नानख़ाने की हर रानी, पद्मावती जितनी वीरांगना नही होती थी.

 डॉ कायनात क़ाज़ी
डॉ कायनात क़ाज़ी

जौहर का डर रूह तक को झंझोड़ने वाला होता था. एक-एक दासी पल-पल की ख़बर लेकर आती थी कि दुश्मन क़िले की सीमा के कितने नज़दीक आ पहुचा है. वे कहतीं “रानी-सा आगे बढ़िए- दुश्मन ज़नानख़ाने की सीमा तक पहुंच गया है. और रानियों मे हिम्मत जगाने के लिए वे भी अग्नि कुंड मे छलांग लगा लेती थी.

कैसा दृश्य होगा होगा. वीरता की ऐसी कहानी चित्तौड़ के सिवा पूरे भारत मे कहीं और सुनने को नही मिलती।. भारत के अब तक के इतिहास में रानी पद्मावती का जौहर सबसे बड़ा जौहर माना जाता है.

जौहर कब शुरू हुआ इसकी सही सही तारीख तो पता नहीं लेकिन इतिहास के जानकारों और उस समय के कुछ साक्ष्यों के अनुसार यह प्रथा 13वीं  शताब्दी में अस्तित्व में आई, जब भारत पर मंगोलों ने आक्रमण किया. डा० मोहनलाल गुप्ता जिन्होंने राजस्थान के इतिहास पर लगभग 25 किताबें लिखी हैं बताते हैं कि मंगोल बड़ी क्रूरता से मार-काट मचाते थे.

उनके मुताबिक़ जब मंगोलों के क़दम राजस्थान की ओर बढ़े तो राजपूत राजाओं ने बड़ी बहादुरी से उनका सामना किया, लेकिन मंगोल टिड्डी दल की तरह आक्रमण करते थे इसलिए उनसे जीतना आसान न था. ऐसे में पराजय की स्थिति नज़दीक होने पर राजपूत अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए तीन परम्पराएं निभाते थे- साका, केसरिया और जौहर.

जिसमे जौहर सबसे पहले किया जाने वाला अनुष्ठान था जिसे क़िले में रहने वाली हर स्त्री अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए आग में कूद कर अपनी जान दे देती थी. वहीं किले के पुरुष वीरता से दुश्मन का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त होने एक साथ क़िले के मुख्य द्वार खोल कर निकलते थे, इस अनुष्ठान को “साका” कहा जाता था.

साका जौहर के अगले दिन सुबह में संपन्न होता था. साका के लिए जाने वाले योद्धा केसरिया रंग के वस्त्र धारण करते थे. इस अनुष्ठान को ही “केसरिया” कहा जाता था. जौहर की परंपरा को बेहतर ढंग से समझने के लिए सन् 1520 ई. में पद्मनाभ जी की लिखित कान्हड़देव प्रबंध को पढ़ना चाहिए.

इस ग्रन्थ में जालौर के दुर्ग में सन् 1306 ई. में हुए जौहर का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है. कहते हैं सन् 1306 ई. में जालौर के दुर्ग में हुए जौहर के साथ जालौर का ऐसा कोई घर नहीं था जिसमें जौहर कुंड न जला हो.

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