MAHASHWETA DEVI के 92nd BIRTHDAY पर गूगल ने आज अपना डूडल किया उन्हें समर्पित

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Mahashweta Devi
Google pays tribute to Mahashweta Devi on her 92nd birthday anniversary

मशहूर साहित्यकार और एक्टिविस्ट  Mahashweta Devi के 92 वें जन्मदिवस पर गूगल ने आज उनके सम्मान में अपना डूडल बनाया है. गूगल ने Mahashweta Devi’s 92 Birthday शीर्षक से डूडल बनाकर उन्हें समर्पित किया है. इस डूडल में बंगाली साड़ी पहने देवी कुछ लिख रही हैं.




साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और रेमन मैगसायसायर पुरस्कार से सम्मानित महाश्वेता देवी ने अपने लेखन के जरिए पिछड़ों के हक़ की आवाज उठाई. उन्होंने महिलाओं, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों का मुद्दा हमेशा उठाया इसलिए उन्हें एक्टिविस्ट भी माना गया.

Mahashweta Devi
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महाश्वेता देवी महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ था. उनकी स्कूली शिक्षा भी वहीं हुई, लेकिन भारत विभाजन के समय उनके किशोरवस्था में ही उनका परिवार पश्चिम बंगाल में बस गया. यहां उन्होंने 1936 से 1938 तक शांतिनिकेतन में पढ़ाई की.




उनके पिता मनीष घटक एक कवि और एक उपन्यासकार थे और उनकी मां धारीत्री देवी भी एक लेखिका और एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं.  देवी पर अपने माता-पिता दोनों का प्रभाव था. उन्होंने बहुत छोटी उम्र से लिखना शुरु कर दिया.

हालांकि कोलकता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना करियर एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में शुरू किया था लेकिन जब बाद में लेखन में उनका मन रमने लगा तो उन्होंने अपने नौकरी से विदा ले ली.

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1957 में उन्होंने अपना पहला “नाती” लिखा. ‘झांसी की रानी’ उनकी प्रथम गद्य रचना है जो 1956 में प्रकाशित हुआ. एक बार उन्होंने कहा था “पहले मेरी मूल विधा कविता थी, अब कहानी और उपन्यास है.” उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में ‘नटी’, ‘मातृछवि ‘, ‘अग्निगर्भ’ ‘जंगल के दावेदार’ और ‘1084 की मां’, माहेश्वर, ग्राम बांग्ला हैं.

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40 सालों में उनकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित हुए हैं और क़रीब 100 उपन्यासों जो सभी बंगला भाषा में थे लिखे. वैसे तो वे मूल रुप से बंगाली लेखिका थीं लेकिन वैचारिक और संवेदनशील लेखन की वजह से उन्हें देश भर से बहुत प्यार और सम्मान मिला. साहित्य जगत में महाश्वेता देवी का नाम बहुत आदर और सम्मान से लिया जाता है.

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फिल्म जगत में भी उन्हें बहुत आदर हासिल है. उनकी कहानी ‘लायली असमानेर आयना’ पर  1968 में दिलीप कुमार और वैजयंती माला की फिल्म संघर्ष बनी. जो बहुत लोकप्रिय फिल्म बनी. 1993 में बनी फिल्म ‘रुदाली’ फिल्म की कहानी भी उनकी कहानी पर बनी थी.

1998 में ‘हजार चौरासी की मां’ ये फिल्म महाश्वेता देवी के नाम से उपन्यास पर आधारित है.  28 जुलाई 2016 को कोलकता में उनका देहावसान हो गया लेकिन साहित्य जगत युग-युग तक महाश्वेता देवी को याद रखेगा.

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