”SANJA FESTIVAL” मालवा संस्कृति का अनोखा त्यौहार जो न जाने क्यों गुम होने लगा?

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Sanja Festival
गीतांजलि गिरवाल POST on Sanja Festival

गीतांजलि गिरवाल:

बचपन की कुछ यादो में एक हैं, ये Sanja Festival.  मम्मा, पापा सरकारी नौकरी में थे और हम जहां रहते थे वहां गली में और कई परिवार भी थे, जो निमाड़ी थे. उनकी बच्चियां यानि हमारी सहेलियां श्राद्ध पक्ष में ये संजा पर्व मानती थी तो हम भी साथ हो लेते थे. बस उनके देखा देखी नकल करते थे बहुत मज़ा आता था इस में. आखरी दिन इसे नदी में ठंडा करने जाते थे बच्चों को दूल्हा दुल्हन बनाते थे और गाते हुए जाते.

मै अपने स्वाभाव अनुरूप हमेशा पुरुष की भूमिका में होती थी. सच बहुत ही लुभाने दिन थे. अब ये पर्व लगभग विलुप्त होने लगा है, मात्र गांव में सिमट कर रह गया है. लोक परंपरा में मालवांचल में कुंवारी कन्याओं का ये एक लोकप्रिय पर्व माना जाता है. गांव की सौंधी मिट्टी सी खुशबु है, इन लोक परम्पराओं में. उज्जैन, आगर, महिदपुर , शाजापुर , निमाड़ , खंडवा , धार में काफी लोकप्रिय त्यौहार है संजा.




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टिफ़िन में भिन्न भिन्न पकवान बना कर सभी लाते थे,आरती के बाद सब उसे बुझते थे कि कौन क्या लाया, जिसका टिफ़िन नहीं बुझ पाते थे, वो विजेता और उसकी मां सुपर मां. फिर सब मिलकर खाते थे.  इसमें लड़कों का कोई रोल नहीं होता था फिर भी सब के भाई अपनी बहनों के पीछे घूमते थे ताकि आखरी में अच्छा अच्छा खाने को मिलेगा. वो 15 दिन पलक झपकते निकल जाते.




यह त्यौहार गणेश उत्सव के बाद आता है. भाद्रपद माह के शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक पितृपक्ष में कुंआरी कन्याएं यह पर्व मनाती है. यह मुख्य रूप से मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में मनाया जाता है. महाराष्ट्र में गुलाबाई (भूलाबाई), हरियाणा में ‘सांझी धूंधा’, ब्रज में ‘सांझी’, राजस्थान में ‘सांझाफूली’ या ‘संजया’ के नाम से जानते हैं. संजा पर्व में श्राद्ध के सोलह दिन कुंवारी कन्याएं शाम के समय एक स्थान पर एकत्रित होकर गोबर के मांडने मांडती हैं और संजा के गीत गाती हैं. संजा की आरती कर प्रसाद बांटती हैं.




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क्वार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर अमावस्या तक शाम ढलने के साथ घर के दालान की दीवार के कोने को ताजे गोबर से लीपकर पतली-पतली रेखाओं पर ताजे फूल की रंग-बिरंगी पंखुड़ियां चिपका कर संजा तैयार की जाती है. गणेश, चांद-सूरज, देवी-देवताओं के साथ बिजौरा, कतरयो पान, दूध, दही का वाटका (कटोरी), लाडू घेवर, घुघरो नगाड़ा, पंखा, केले का झाड़, चौपड़ दीवाली झारी, बाण्या की दुकान, बाजूर, किल्लाकोट होता है.

मालवा में ‘संजा’ का क्रम पांच (पंचमी) से आरंभ होता है. पांच पाचे या पूनम पाटला से. दूसरे दिन इन्हें मिटाकर बिजौर, तीसरे दिन घेवर, चौथे दिन चौपड़ और पंचमी को ‘पांच कुंवारे’ बनाए जाते हैं. लोक कहावत के मुताबिक जन्म से छठे दिन विधाता किस्मत का लेखा लिखते हैं, जिसका प्रतीक है छबड़ी. सातवें दिन सात्या (स्वस्तिक) या आसमान के सितारों में सप्तऋषि, आठवे दिन ‘अठफूल’, नवें दिन ‘वृद्धातिथि’ होने से डोकरा-डोकरी और दसवें दिन वंदनवार बांधते हैं.

ग्यारहवें दिन केले का पेड़ तो बारहवें दिन मोर-मोरनी या जलेबी की जोड़ मंडती है. तेरहवें दिन शुरू होता है किलाकोट, जिसमें 12 दिन बनाई गई आकृतियों के साथ नई आकृतियों का भी समावेश होता है. परम्परागत मान्यता के अनुसार गुलतेवड़ी के फूल सजावट के लिये उपयुक्त समझे जाते हैं. संजा की आकृति को और ज्यादा सुंदर बनाने के लिये हल्दी, कुकुंम, आटा, जौ, गेहूं का भी प्रयोग किया जाता है.

 

(साभार-फेसबुक वॉल)

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