किस दिन कहेंगे BLEEDING हो रही, हिला नहीं जा रहा, दाग लगा तो क्या करें?

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menstruation
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रीवा सिंह:

हाल में ही तमिलनाडु की 13 वर्षीय फ़ज़ाना ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके सलवार पर Period का दाग लग गया था. कथित तौर पर उसकी 26 वर्षीय टीचर ने उसके सलवार पर लगे दाग के लिए उसे क्लास में ज़लील किया था. फजाना को ये बात चुभी कि क्लास में सबके सामने मतलब सभी लड़के-लड़कियों के सामने उसे सलवार पर लगे दाग के लिए अपमानित किया गया. उसकी प्रिंसिपल ने रही-सही कसर पूरी करते हुए इसलिए फटकारा क्योंकि उसे पीरियड्स में Bleeding के दौरान अपना ख़्याल रखना नहीं आता था. फ़ज़ाना का यह तीसरा पीरियड था.




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उसकी रोती हुई मां कहती हैं कि पूरे क्लास के सामने दाग के लिए बोल दिया इसलिए बच्ची ने ऐसा किया. दरअसल ऐसी स्थिति के लिए हम सब दोषी है. शुरु से ही बच्चियों को इस बात की घुट्टी पिलाई जाती है यदि कपड़े में दाग लग जाए तो इससे बेइज्ज़्ती होती है और इसका किसी को पता नहीं चलना चाहिए. यही बात फजाना को याद थी टीचर की बात ने उसे अपमानित किया क्योंकि उसके पीरियड और दाग के बारे में पूरी क्लास को पता चल गया जिसमें लड़के भी थे.

वहीं जिस टीचर को कायदे से उसकी मदद करनी चाहिए थी, उस दाग को संयुक्त राष्ट्र संघ में बहस लायक मुद्दा बना दिया. जिसे उसके पीछे की प्रक्रिया और विज्ञान समझाना था, वह सामाजिक वर्जनाओं में उलझी रह गयी. फ़ज़ाना की मां ने रोते हुए उसके मरने का कारण दाग पर हुई बेइज़्ज़ती इस तरह से बताया जैसे इतनी बेइज़्ज़ती के बाद आत्महत्या ही एकमात्र रास्ता है. आखिर फजाना की मौत का जिम्मेदार हम किसे माने?




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बड़ी होती बेटी को मां जब भी समझाने बैठती है कि अब उसमें क्या बदलाव आने वाले हैं तो इसके लिए वह घर का कोई ऐसा कोना पकड़ती है जहां और कोई न हो. उसे चुपके-से अपनी बेटी को बताती है कि हर महीने उसकी योनि से खून निकलेगा जिसमें उसके औरत होने की सार्थकता होगी. इसी दौरान बेटी को यह घुट्टी भी पिलायी जाती है कि इसका ज़िक्र अपने पिता व भाई समेत दुनिया के तमाम पुरुषों से नहीं करना है. यहीं दाग से अपमान और बेइज़्ज़ती को इस तरह जोड़ दिया जाता है कि बेचारी लड़कियां कई साल इस आंखमिचौनी में ही बिता देती हैं.

सामाजिक वर्जनाओं के कारण ही हम पीरियड्स पर खुल कर बात नहीं करते. पीरियड से पेट दर्द हो तो कहते हैं तबीयत ठीक नहीं. हालांकि कॉलेज पहुंचते तक यह पता चल चुका होता है कि जिस बात को आप पुरुषों से छिपाती आईं वो हर पुरुष को पता है, फिर भी आप ऑफ़िस में बैठकर ये नहीं कह पातीं कि बहुत ब्लीडिंग हो रही है, हिला नहीं जा रहा है, आज हाफ़ डे लूंगी. आपके बॉस पुरुष भी हैं तो समझ जाते हैं और आप भी समझती हैं कि वो समझ गए होंगे.




उस समाज में जहां पीरियड्स का ज़िक्र ही लोगों को असहज बना देता है वहां कपड़े पर दाग लग जाए तो मानों पहाड़ टूट पड़ा हो. Menstruation जीवन की तमाम नैसर्गिक प्रक्रियाओं में से एक है. इसे लेकर हम जितनी जल्दी सहज हो जाएं बेहतर है. दुकान से सैनिटरी नैपकिन जिस दिन काले पॉलीबैग में लाना बंद करेंगे, पीरियड्स के दर्द को बुखार और जुकाम न कहकर पीरियड्स का दर्द कहना शुरू करेंगे तभी दुनिया को मेंस्ट्रूअल क्रैंप्स सुनने व समझने की आदत पड़ेगी.

कपड़ों पर लगे दाग को प्रतिष्ठा का सवाल नहीं बनाएंगे तो लोग भी दाग देखकर चौंकना बंद करेंगे. आपके कपड़े पर लगा दाग आपका चरित्रचित्रण नहीं करता. वो दाग आपका हिस्सा है. दाग एक लापरवाही हो सकती है, जिल्लत नहीं. जिस दिन टीवी पर नैपकिन के विज्ञापन आते ही आप चैनल बदलने या उठकर चल देने का ख़्याल मिटा देंगी, हल्का महसूस करेंगी.

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