GODDESS समझो न समझो, लड़कियों को इंसान तो मानो

39678
Goddess
Kanya pujan during Navratri

प्रितपाल कौर:

वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका:

इन दिनों नवरात्रि की धूम चारों तरफ है. बाज़ार तरह-तरह के पूजा के सामान से अटे पड़े हैं. मंदिरों में रोजाना मां के विभिन्न रूपों की पूजा हो रही है. घरों में व्रत के पकवान बन रहे हैं. लगभग सभी  रेस्टोरेंट और फ़ास्ट फ़ूड चेन्स में भी व्रत की विशेष थाली हर वक़्त तैयार मिलती है. इस नौ दिनों में बेटियों को Goddess के समान दर्जा दिया जाता है.




ये नौ दिन उत्तर भारत में त्यौहारों के शुभ आगमन की रंगीन दस्तक ले कर आते हैं. लेकिन इन्हीं नौ दिनों के दौरान एक सवाल भी हर बार उठ खड़ा होता है कि हम अपनी बेटियों का सम्मान सिर्फ इन 9 दिनों में ही क्यों करते हैं?

MUST READ: DURGA स्त्री- अस्मिता से जुड़ीं  और… अस्मिता पर हमला बर्दाश्त से बाहर

 

देश में स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों की बातें आये दिन हम ख़बरों में देखते-सुनते हैं तो लगता है कि जैसे हमारे समाज से स्त्री के सम्मान का रिश्ता टूट सा गया है.

आजकल बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी का मुद्दा बेहद गरमाया हुआ है. कॉलेज की एक छात्रा के साथ सड़क पर हुई छेड़-छाड़ के बाद जब उसने अधिकारियों से इसकी शिकायत करनी चाही तो उसकी सुनवाई नहीं हुई.  बात खुली तो पता लगा कि ऐसी वारदात यहां रोजाना होती हैं.




जब छात्राओं ने इस अन्याय के खिलाफ धरना दिया तो पुरुष पुलिस ने लड़कियों को डंडों से पीटा. ये कृत्य बेहद शर्मनाक है और नवरात्रि में होने पर और भी कड़े और मुश्किल सवाल खड़े करता है.

प्रितपाल कौर ,वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका

एक तरफ लड़कियों पर डंडे बरसाए गए और दूसरी तरफ अष्टमी और नवमी को कन्या भोजन कराने के लिए उनकी तलाश शुरु हो जाएगी. नौ कन्याओं की पूजा करने और उन्हें खाना खिलाने के लिए समाज में मानो होड़ सी मच जाती है.

ये वो दिन होते हैं जब हमें अक्सर समाज में कन्याओं की कमी साफ़ तौर पर महसूस होती है. लोग घर- घर जा कर आदर और प्यार से बेटियों को लेकर आते है. ये बहुत अच्छी बात है. लेकिन इससे कई सवाल और खड़े होते हैं.

MUST READ: MAA DURGA की पूजा में लाल रंग का खास महत्व क्यों है ?

 

सबसे बड़ा सवाल तो ये कि कन्या भ्रूण हत्या कानूनन जुर्म होने के बावजूद यह घृणित काम दबे छिपे हो रहा है तभी तो कन्याएं ढूंढने जाएं तो वह जल्दी मिलती नहीं. लड़के और लड़कियों का अनुपात बिगड़ गया है. लडकियां कम होती जा रही हैं.




संपन्न घरों की बच्चियों को खिलाने और पूजने के बजाए क्यों न गरीब घरों की बच्चियों को खिलाने को प्राथमिकता दी जाए. इसके कई लाभ हैं.  एक तो उन बच्चियों को सम्मान देने से उनका मान बढ़ेगा, आत्म-विशवास जागृत होगा. साथ ही उन बच्चियों को हम स्वादिष्ट भोजन करवाएंगे जो वे अक्सर नहीं कर पातीं जबकि संपन्न घरों के बच्चों का अच्छा खाना रोज़ ही मिलता है.

इसके अलावा हमें ये काम साल में सिर्फ एक-दो बार ही नहीं बल्कि महीने में दो महीने में कर सकते हैं. बच्चियों का ऐसा सम्मान अधिक बार होते देख कर देवी अवश्य प्रसन्न अवश्य होंगीं, ये मेरा दावा है.

हालांकि इस वक़्त सबसे ज़्यादा ज़रुरत इस बात की है कि लड़कियों को देवी का नहीं बल्कि मानवी का दर्जा पूरी समानता के साथ दिया जाए. वह दर्जा जो किसी भी मानव की संतान का होना चाहिए. चाहे वो स्त्री हो या पुरुष. हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जो समानता पर आधारित हो. सिर्फ कन्या पूजने और खिलाने भर से काम नहीं चलेगा.

 

Facebook Comments