अब क्यों नहीं कह पाएंगे TALAQ-TALAQ-TALAQ

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triple_talaq
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देश की मुस्लिम महिलाओं का जिस बात का इंतजार था वो फैसला आ गया. आज से देश में Triple Talaq खत्म हो गया है. तीन तलाक पर सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों वाली संविधानिक पीठ ने बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है. इस तरह आज से भारतीय मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी मिल गई है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने तीन Talaq पर छह महीने के भीतर केंद्र सरकार से कानून बनाने के लिए कहा है.

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सुप्रीम कोर्ट के जहां जस्टिस जे एस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने इस गेंद को केंद्र सरकार के पाले में डाल दिया वहीं जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन ने इसे अंसैवधानिक करार दिया है. दुनिया के करीब 22 देशों में 3 तलाक तक़रीबन नहीं है. इस फैसला से भारतीय मुस्लिम महिलाओं को भी एक राहत मिली है. तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं ने याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर न्याय की गुहार लगाई थी.




3 तलाक यानी पति तीन बार ‘तलाक’ बोलकर अपनी पत्नी को छोड़ सकता है. निकाह हलाला यानी पहले शौहर के पास लौटने के लिए महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और फिर उसे तलाक देना होता है. कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया.

‘तीन तलाक’ की सुनवाई पर एक नजर…

इस मामले पर सुनवाई करने वाली पांच सदस्यीय बेंच की अध्य क्षता चीफ जस्टिस जेएस खेहर कर रहे थे. जस्टिस खेहर 27 अगस्त को रिटायर होंगे.

इस खंड पीठ में सभी धर्मों के जस्टिस शामिल हैं जिनमें चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (क्रिश्चिएन), जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन (पारसी), जस्टिस यूयू ललित (हिंदू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल हैं.




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इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 11 से 18 मई तक सुनवाई चली थी और फैसले को सुरक्षित रख लिया गया था.

मार्च, 2016 में उतराखंड की शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी

बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है

मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986

.यह अधिनियम शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आया था




1978 में इंदौर की रहने वाली 62 साल की मुस्लिम महिला शाह बानो को उसके पति ने तलाक दे दिया था

5 बच्चों की बुजुर्ग मां ने गुजारा भत्ता पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी

1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के हक में फैसला सुनाया

सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी शाहबानो को पति से हर्जाना नहीं मिल सका

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरज़ोर विरोध किया

इस विरोध के बाद 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया

इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया था

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