मध्यप्रदेश के मुक्ति गांव की सत्यकथा- DOMESTIC VIOLENCE से तंग होकर करा दी थी शराबबंदी पर अब फिर है बेबसी

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Domestic Violence
victims of domestic violence

राजेन्द्र बंधु:

‘‘यदि घर में आदमी शराब पी कर आए और Domestic Violence भी करे तो तो पुलिस बुलाने की गलती मत करना.’’ ऐतिहासिक रूप से ‘मुक्ति’ गांव के नाम से विख्यात रहे मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के इस गांव बांसाखेड़ी गांव की महिलाओं को पुलिस से यही सलाह मिली. यहां की महिलाओं ने अपने दम पर इस गांव में शराबबंदी कर दी थी, लेकिन अब वे फिर अपने शराबी पतियों से पिटने को मजबूर हैं.

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Victims of domestic violence

एक मामले में जब उन्होंने 100 नंबर डायल कर पुलिस बुलाई तो पुलिस अधिकारियों ने कहा दिया ‘‘शराब पीने में कोई बुराई नहीं. बस पीकर घर में ही रहा करों, बाहर झगड़ा मत करो.’’ पुलिस की यह सलाह आदमियों के लिए ऐसा वरदान बन गई कि गांव में शराब की खपत दिन दूनी और रात चौगुनी हो गई.




बांसखेड़ी गांव का नाम 2002 में उस समय प्रमुखता से सामने आया था, जब बंधुआ मुक्ति मोर्चा के स्वामी अग्निवेश ने यहां के 14 परिवारों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करवाकर यहां बसाया था. उन्‍होंने ही इस गांव को मुक्ति गांव का नाम दिया.

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ये 14 परिवार तो किसी तरह अपने पैरों पर खड़े हो गए, लेकिन गांव के बाकी लोगों  के लिए रोजगार का अकाल कायम था. दूसरी ओर सैकड़ों एकड़ जमीन के मालिक उनसे कम से कम पैसों में ज्यादा से ज्यादा काम करवाने की जुगत लगा रहे थे.

इसलिए उन्होंने अवैध शराब बनाना और शाम को घर जाते समय आदमियों को एक बोतल शराब देना शुरू किया. आदमियों को हर रोज एक बोतल शराब खूब रास आने लगा. जमींदारों के घर काम करने वालों के कोई कमी नहीं रही.

यदि कोई कमी थीं तो मजदूरों के घरों भोजन की, बच्चों के लिए दूध और कपड़ों और महिलाओ के लिए इलाज की. क्योंकि मजदूरी का हिसाब करते समय जमींदार शराब के इतने पैसे काट लेते थे कि उन्‍हें घर ले जाने के लिए कोई खास पैसे नहीं बचते थे. महिलाएं मजदूरी करके किसी तरह परिवार का पालन पोषण करती थीं.




गांव की महिला उर्मिला बताती हैं बात सिर्फ भरण पोषण की नहीं थीं. उससे भी गंभीर बात यह थी कि नशे में धुत आदमी आकर पत्नियों की की पिटाई करते. जब नशे में धुत आदमी घर पहुंचते और मजदूरी से थकी-हारी महिलाओं को खाना बनाने में देर हो जाती तो उनकी बुरी तरह पिटाई करते थे.

औरतें किसी तरह अपनी जान बचातीं. आखिरकार उन्होंने एक दिन सोचा कि ऐसा कब तक चलेगा?  उर्मिला और जसवंत ने बाकी महिलाओं से बातचीत शुरू की. बाकी महिलाएं इस अभियान से जुड़ती गई.  2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन ग्रामसभा में महिलाओं ने गांव में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा कर दी.

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तय हुआ कि जो भी व्यक्ति गांव में शराब पीएगा या शराब पीकर आएगा उसे महिलाएं घर में नहीं घुसने देगी. साथ ही  महिलाओं की पंचायत में उसे 500 रूपए जुर्माना देना पड़ेगा. महिलाओं की इस संगठित आवाज का नतीजा था कि आदमियों ने शराब पीना छोड़ दिया. यदि कोई शराब पी लेता था तो उसे दूसरे गांव में रात बितानी पड़ती थीं.




जसवंत बताती हैं कि हालांकि हम यह नहीं समझ पाए कि हमारी लड़ाई सिर्फ हिंसा और शराब से नहीं है, बल्कि शराब के बदले सस्ते में मजदूरी करवाने वाले जमीनदारों के खिलाफ भी है. हम शराबी मर्दों को जुर्माने का डर दिखा रही थे और जमींदार उन आदमियों को जोरू का गुलाम कहकर शराब पीने का हौसला दे रहे थे.

शराबबंदी की इस व्यवस्था के बीच दीवाली के दिन जमींदारों ने आदमियों को शराब का बोतल गिफ्ट किया. जब आदमी शराब पीकर घर पहुंचे तो महिलाओं ने अपत्ति जाहिर की. इस तरह दीवाली के दिन घर-घर में झगड़ा शुरू हो गया.. शराब का विरोध करने पर एक आदमी ने अपनी गर्भवती पत्नी की इतनी बुरी तरह पिटाई कि उसका गर्भपात हो गया और वह बुरी तरह घायल हो गई.

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इन महिलाओं का कहना है कि घटना की गंभीरता को देखकर हमने 100 डायल कर पुलिस बुला ली. महिलाओं को उम्मीद थीं कि पुलिस शराबियों को रोकेगी और हिंसा करने वालों को थाने ले जाएगी, लेकिन पुलिए वाले आए, उन्होंने सबकी बात सुनी.

पर यह फरमान सुनाकर चली गई कि ‘‘शराब पीने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन यदि शराब पीकर झगड़ा किया तो खैर नहीं.’’ पुलिस के जाते ही गांव के आदमी जश्‍न मनाने लगे. वे कहने लगे कि अब तो पुलिस ने भी कह दिया कि शराब पीने में कोई बुराई नहीं’’ अब कौन रोकेगा हमें शराब पीने से?

इस तरह 2 अक्टूबर गांधी जयंती से लेकर 19 अक्टूबर दीवाली तक 17 दिनों की शराबबंदी के बाद बांसखेड़ी गांव वापस उसी ढर्रे पर लौट आया. यहां की महिलाओं का आरोप है कि पुलिस के बढ़ाए मनोबल से अब आदमी बेखौफ शराब पीकर अपने घर जाते हैं, महिलाएं पिटती है और उनके अधनंगे बच्चे नंगे पैर इधर-उधर घूमते देखे जा सकते हैं. यही इस मुक्ति गांव की सत्यकथा है.

 

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