गीताश्री की ‘HASINABAD’-एक स्त्री जब अपनी अलग राह बनाना चाहती है तो सबकी निगाहों में चुभने लगती है

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प्रभात रंजन:

‘Hasinabad’ एक कस्बाई स्त्री का सपना है. कदम-कदम पर स्त्री की हर अदा को घूरने वाले पुरुषों के संसार में एक ऐसी स्त्री के लिए अपना मुकाम बनाना बहुत मुश्किल होता है. गीताश्री का उपन्यास ‘हसीनाबाद’ इस निरंतर बदलती दुनिया में कभी न बदलने वाले सच की कहानी है. वह सच यह है कि एक स्त्री जब उसके लिए बनाई गई राह से अलग अपनी राह बनाना चाहती है तो सबकी निगाहों में चुभने लगती है.




 

उपन्यास की नायिका गोलमी ऐसी ही एक लड़की है, जो सपने देखती नहीं बुनती है. उसका एक छोटा-सा सपना है शहर में अपना ऑर्केस्ट्रा का नाम जमाना. लेकिन कस्बे की राजनीति, समाज की जाति-संरचना इस तरह से करवट लेती है कि जिस नेता रामबालक सिंह ने अपने चुनाव में प्रचार के लिए उसके जलवे का इस्तेमाल किया था अगली बार उसकी जगह उसी को टिकट मिल जाता है.




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सफल नर्तकी बनने का सपना देखने वाली गोलमी दिल्ली पहुच जाती है, मंत्री बन जाती है. देखने में यह एक स्त्री सफलता की आम कहानी सी लगने लगती है लेकिन एक दिन गोलमी सब कुछ छोड़-छाड़ कर अपने हसीनाबाद लौट आती है. शिखर का अकेलापन उसे वापस अपने लोक में ले आता है.

असल में हसीनाबाद क्या है? महज पुरुषों के रमन-चमन का ठिकाना, जो न जाने कब से शाम के शाम गुलजार होता आया है. असल में यह एक रूपक है. स्त्री स्टीरियोटाइप से बाहर छवि का रूपक. स्त्रियों को उसके देह से, उसके नेह से ऊपर उठकर शायद ही देखा जाना चाहिए.




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वह जिस सफलता समझती है वह भी असल में एक दूसरी तरह की गुलामी ही है. पुरुष उसे अपने कब्जे में लेकर आजाद कर देता है. तभी तो शायद उपन्यास की नायिका गोलमी पुरुषों के उस खेल से ही खुद को आजाद कर लेती है. एक जीवंत कस्बाई उपन्यास, जिसमें स्थानीय पोपुलर कल्चर की परफेक्ट छौंक है और एक ठोस पोलिटिकल स्टेटमेंट भी.

उपन्यास- हसीनाबाद; लेखिका- गीताश्री; प्रकाशक- वाणी प्रकाशन; मूल्य- 250(पेपरबैक)

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