घोड़ी पर चढ़कर कहां से लीला ने निकाला MARRIAGE PROCESSION?

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लीला मेघवाल
लीला मेघवाल

उस परिवेश और भूगोल में दलित दूल्हे का भी अपने विवाह में घोड़ी पर चढ़ कर निकलना उनकी सोच से बाहर था. लेकिन पश्चिमी राजस्थान के पाली जिले के एक छोटे से गांव गुढ़ा दुर्जन में 2 जुलाई को कुछ ऐसा हुआ जिसने दलित समुदाय के चेहरे पर संतोष की मुस्कान उभर आई.  दुल्हन लीला ने वर की जगह घुड़चढ़ी कर अपने हको- हकूक की नयी इबारत लिखी.




जब दुल्हन के परिधान में सजी-धजी लीला घोड़ी पर होकर निकली तो दलित समुदाय के चेहरे खिल गए थे. वे अपनी इस खुशी के लिए वे सदियों से कामना करते रहे है. हालांकि गांव में तनाव को देखते हुए पुलिस सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया गया था. फिजा में तल्खी के बीच ही मंगल गान गूंजे ,मेहंदी लगी और दलित समुदाय ने हर्ष ध्वनि की.




दुल्हन लीला के भाई कालूराम मेघवाल इस पर अभिभूत थे. कालूराम कहते है ”अपनी बहिन लीला को दुल्हन के रूप में घोड़े पर चढ़ा देखना बहुत भावुक कर देने वाला दृश्य था. परिवार के अनुसार पाली में ही लीला की अपनी बारात आई थी. घोड़ी पर चढ़ने के लिए लीला ने गांव में प्रभावशाली वर्ग के लोगों की चेतावनी को अनसुनी कर दी. दुल्हन के घोड़ी पर चढ़ कर निकलने के प्रस्ताव पर प्रभावशाली वर्ग के लोगों ने विरोध की चेतावनी दी थी.




परिवारजनों के मुताबिक इस चेतावनी के बारे में जिला प्रशासन को  शिकायत की और पुलिस मदद की गुहार लगाई, क्योंकि इससे पहले जब भी दलित दूल्हे अपनी बारात लेकर निकले तो वे  पैदल ही गांव के प्रमुख रास्ते से होकर अपनी बारात लेकर जाते. लीला की शादी से पहले गत 18 जून को गांव के ही एक दलित की बारात पैदल ही निकली थी.
दलित अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी कहते है  यह एक सुखद शुरुआत है. दलित समुदाय ने अपनी बेटियों को अधिकार सम्पन्न बनाने का बीड़ा उठाया है, लेकिन तकलीफ की बात है कि आज भी दलितों को शादी में घोड़ी पर चढ़ने के लिए पुलिस का संरक्षण लेना पड़ रहा है.

पाली के खिवांड़ा पुलिस थाने के थानाधिकारी राजूराम खुद इस मौके पर मौजूद थे. विवाह विधि के जानकर जयपुर के ज्योतिषी पंडित सुरेश जोशी भविष्य पुराण का संदर्भ देकर कहते है हिन्दू विधि में दूल्हे के घोड़ी पर चढ़कर दुल्हन के घर पहुंचे की परम्परा का उल्लेख है. वे कहते है घुड़चढ़ी तो शुभ कार्य है.

दलित समुदाय को लगता है लीला जिस मार्ग से घोड़ी पर चढ़ कर निकली है वो अब दलित अधिकारों का रास्ता खोल गया है.

(वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारहठ की फेसबुक वाल और फोकस भारत से साभार)

 

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