फेमिनिस्ट को भी है अपनी खूबसूरती का जश्न मनाने का RIGHT

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The three superwomen Chanda Kochar, Neeta Ambani,Arundhati Bhattacharya

सुमन बाजपेयी:

वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका:

फेमिनिज्म के नये लक्ष्य हैं और नयी लड़ाइयां नयी चुनौतियां हैं और उसे भी अपनी खूबसूरती का जश्न मनाने का Right है. यह व्यक्तिवादी स्त्रीवाद है, जो अपने जीवन में अपनी हासिल आजादियों की कीमत चुकाता है और आनंदित भी होता है. एक फेमिनिज्म फैमिली फेमिनिज्म का है जहां औरत को घर में आजादी मिलती है.




एक फेमिनिज्म वह है जिसमें वह सुपर वुमन है, आत्मनिर्भर है! लेकिन विडंबना यह है कि फेमिनिज्म को समाज में जिन नजरों से देखा जाता है उसमें औरत की छवि कुछ अलग तरह से उभर कर आती है–चौड़े बॉर्डर वाली सूती साड़ी पहने, बड़े-बड़े बूंदे कानों में लटकाए, हाथ में फाइल और कंधे पर झोला–तेज कदमों से चलती या किसी जगह खड़ी होकर  बुलंद आवाज में शोर मचाती. यानी कि एकदम एथनिक लुक.

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इन्हें एकदम नफासत में ढली दिखना चाहिए, कहीं से भी कोई कमी नहीं होनी चाहिए, आखिरकार फेमिनिस्ट जो ठहरीं. ये वे औरतें हैं जो गरज तो सकती हैं पर उम्मीद की जाती हैं कि ये फैशन से दूर रहें. ग्लैमर व मेकअप से तो तौबा ही कर लें. इन पर सूट नहीं करेगा, लिपा-पुता चेहरा.




बड़े चुपके से उन्हें समाज अपराधबोध से ग्रस्त करने को तैयार हो जाता है. स्त्रियां खुद को खुशी व आराम देने वाली चीजें तक खरीदने में गुनाहगार सा महसूस करने लगती हैं. खुद को खुश रखना गुनाह क्यों माना जाने लगा? पता ही नहीं चला. सजना-संवरना उसका नैसर्गिक हक है. उसे भी अपनी खूबसूरती का जश्न मनाने का अधिकार है. इसमें फेमिनिज्म से जुड़ी सोच बीच में कहां आती है. अगर उसे डार्क मेकअप कर खुशी मिलती है, अगर उसे बैकलेस चोली पहनकर इतराने में खुशी मिलती है तो वह ऐसा क्यों न करे?

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सुमन बाजपेयी,वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका

वह अपनी सुविधानुसार मेकअप करे, फैशन करे, पुरुष को लुभाने के लिए नहीं. औरत को अपनी पहचान और आत्मसम्मान के लिए सजना-संवरना चाहिए. फेमिनिज्म और फैशन एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं. फैशन कला, संस्कृति, इतिहास, प्यार व जुनून का प्रतिनिधित्व करता है. अगर आज फैशन पर इतना फोकस किया जा रहा है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि फेमिनिन फैशन कहीं ज्यादा आकर्षक होता है. यह एक सामाजिक बदलाव लाता है क्योंकि यह स्वयं को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है.   




सच तो यह है कि हर कामयाब औरत फेमिनिस्ट होती है और इससे औरत के ऊपर जो टैग लगा दिया जाता है, वह समाज की छोटी सोच की वजह से होता है, उसके बराबरी का हक मांगने की वजह से नहीं. खुलकर ग्लैमर को जीओ और फैशन को ओढ़ो.

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