बैंक की कतार में चिंता की बात नहीं

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‘अब तो दूध लेने के लिए भी पैसे नहीं बचे. बच्चों को दो दिनों से दूध नहीं दिया है. 2000 के नोट के छुट्टे कोई देने को तैयार नहीं है.’  झंडेवालान स्थित आईडीबीआई बैंक में नोट बदलवाने के लिए कतार में खड़ी विवला बेहद तनाव में आ गई. यही हाल संसद मार्ग में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एटीएम से पैसे निकलाने आई रमा सुंदरी का भी दिखा.




वे जनपथ के आस-पास छोटे-मोटे सामान बेचकर अपने घर का खर्च चला रही हैं. लेकिन सामान खरीदने और घर के खर्चे पूरा करने के लिए अब पैसे नहीं बचे तो दो दिनों से एटीएम के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन चार-पांच घंटों के इंतज़ार के बाद भी उनका नंबर नहीं आया.




विवला और रमा अकेली महिला नहीं जो 500 और 1000 रुपए अचानक बंद हो जाने के अपने रोज़मर्रा के घरेलू खर्चों पूरा कर पाने मे बहुत परेशानी महसूस कर रही हैं. देश की लाखों गृहणियाों को अभी इसी समस्या से जूझना पड़ रहा है. जब वुमनिया की टीम ने देश के अलग- अलग शहरों में बैंकों और एटीएम की कतार में लगी  महिलाओं से बात की  तो लोगों ने कुछ इस तरह की प्रतिक्रियाएं दी….




गाजियाबाद निवासी मीनाक्षी तोमर ने बताया ‘ अपने बच्चे की गुल्लक फोड़ कर उसमें जो पैसे निकले हैं उससे घर का खर्च चल रहा है. हर चीज़ में कटौती कर रहे हैं क्योंकि बैंक की लंबी कतार में खड़े हो कर घंटों इंतजार करना आसान बात नहीं है. ’ जयपुर की स्वाति कपूर भी छुट्टे न मिलने और बैंक और एटीएम में लगी लंबी लाईनों से  से परेशान हैं . वह कहती हैं कि, ‘ हमें अपने हर खर्चे पर क़ाबू करना पड़ रहा है.  बड़ी मुश्किल से बैंक में घंटों खड़े रहने के बाद पुराने नोट बदलवाने के बाद 2000 रुपए के नोट मिले लेकिन कोई छुट्टे देने को तैयार नहीं होता. अगर छोटा सा कोई सामान खरीदना हो तो 2000 रुपए का नोट देखते ही दुकानदार सामान देने से मना कर देता है. हर सामान मॉल से भी नहीं ले सकते क्योंकि महंगा मिलता है. ’

कानपुर की गृहिणी मीना गुप्ता अपनी समस्या बताते हुए कहती हैं, ‘पहले हफ्ते भर की सब्जी आ जाती थी मगर अब ऐसा नहीं है. अब रोज़ के हिसाब से सब्जी आती है. अकाउंट में पैसे होने के बावजूद हम निकाल नहीं पा रहे. कब तक  लाइनों में लगे रहे. ’बहुत सारी महिलाओं को कुछ रुपए पाने के लिए  सुबह 5 बजे से लाइन में लगना पड़ रहा है क्योंकि जरुरत की चीजें खरीदने के लिए उनके पास बिल्कुल पैसे नहीं है.  छोटे बड़े खर्चों के लिए उन्हे रोज़ ही मुश्किलों से दो-चार होना पड़ रहा है.

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