औरंगजेब ने भी शादी-ब्याह और दूसरे अवसरों पर CRACKERS जलाने पर लगाई थी पाबंदी

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प्रितपाल कौर:
वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका:
 
मेरी उम्र शायद दस बरस की रही होगी. मैं और मेरा भाई अपने पापा के साथ बाज़ार से Crackers लेकर घर आए थे. अगले दिन पड़ने वाली दिवाली की तैयारी में.  मेरी मां के एक सहयोगी कुछ ज़रूरी काग़ज़ात पर उनसे दस्तखत करवाने घर पर मौजूद थे.
 




मैंने उत्साह में घर पर लगे मां के दफ़्तर में अपनी ख़रीदारी की नुमाइश शुरू कर दी. इस पर उन अधेड़ वय के सहयोगी ने जो कहा उसने मेरा नज़रिया ही बदल दिया.
 
प्रितपाल कौर ,वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका

” इन पटाखों से ख़ुशी नहीं मिलेगी बच्चे. मैं अपने घर आज किलो भर लड्डू, सेब और केले लेकर जाऊंगा. मेरे बच्चों को उनसे ख़ुशी मिलेगी.” 

 
उसके अगले साल हमारे घर पटाखे नहीं आए थे. वो कहानी अपनी जगह है, लेकिन दिवाली की ख़ुशी में कब और किस तरह पटाखे और आतिशबाज़ी शामिल हो गई ये बात हम सब जानते हैं. दिवाली सिर्फ़ पटाखे और आतिशबाज़ी ही नहीं है. दिवाली जैसा कि ज़ाहिर है रोशनी, जश्न, अच्छा नया पहनने और बढ़िया पकवान मिठाइयां बनाने और खाने का भी दूसरा नाम है.




 
दिवाली के कितने ही दिन पहले से घरों और बाजारों में रोशनी और रौनक़ बढ़ जाती है। यूं लगता है हर इन्सान ख़ुश और सुखी है. ग़म का कहीं नामोनिशान ही नहीं. लेकिन इन सब के बीच पिछले कुछ वर्षों में दिवाली का त्यौहार धीरे धीरे दिखावे के त्यौहार में बदल गया है.




 
जिसकी जितनी आर्थिक सामर्थ्य है वह उतना ही बढ़-चढ़ कर पटाखे और आतिशबाज़ी करता है. एक के बाद एक हजारों  लड़ियां को एक साथ फोड़कर समृद्ध लोग जलाते हैं. दिखावा इतना बढ़ गया है कि इससे होने वाले प्रदूषण से हो रही तकलीफ़ों से बचने के लिये सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और एनसीआर में पटाखों पर प्रतिबंध ही लगा दिया है. 
 
कोर्ट के इस आदेश के विरोध और पक्ष में कई तरह के स्वर मुखर हो रहे हैं. कई तरह की दलीलें और विवाद सामने आए हैं. ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा आदेश पहली बार ही आया है. लेकिन राजस्थान स्टेट आर्काइव्ज़ के निदेशक महेंद्र खडगावत के अनुसार 8 अप्रैल 1667 को मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने भी एक आदेश जारी कर विवाह व अन्य अवसरों पर पटाखों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई थी. यानी सुप्रीम कोर्ट का आदेश अपनी तरह का यह पहला आदेश नहीं है. 
 
ज़ाहिर है पटाखों के शोर और धुएं से होने वाली परेशानी से लोग तभी से परिचित रहे हैं. यही वक़्त है हम समझें कि स्वास्थ्य की क़ीमत पर त्यौहार मनाना कितना जोखिम भरा हो सकता है. बहुत से लोगों ने पटाखों पर बैन से राहत की सांस ली है लेकिन कुछ लोग इस से बैन से सहमत नहीं हैं. ज़रूरत इस बात की है कि हम रोशनी के इस बेजोड़ त्यौहार के जोश को भी कम ना पड़ने दें और अपने स्वास्थ्य का भी पूरा पूरा ख़्याल रखें. 
 

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