कैसे औरतों तक पहुंचा दिए सस्ते नैपकिन?

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arunachalam muruganantham making low cost sanitary napkins
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प्रतिभा ज्योति:

वे छोटे-मोटे काम-धंधे करके अपना परिवार चला रहे थे. 19 साल पहले एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी को कुछ छिपाते देखा तो पूछने लगे कि क्या छुपा रही हो? मालूम चला कि वो गंदा सा कपड़ा छिपा रही थी जिसका इस्तेमाल वो पीरियड्स के दौरान कर रही थीं. अरुणाचलम मुरुगनाथम ने पत्नी से सैनिटरी नैपकिन खरीदने को कहा तो उसने बताया कि अगर वो ये करे तो घर का बजट ही बिगड़ जाएगा.




मुरुगनाथम चौंके और पास की ही एक दुकान से सैनिटरी नैपकिन खरीदा. उन्हें अचंभा हुआ कि 40 पैसे की कॉटन के लिए कंपनियां 4 रुपए वसूल रही हैं. उन्होंने फैसला किया कि वे खुद ही सस्ता सैनिटरी नैपकिन बनाकर पत्नी को देगें. छोटी सी उम्र में पिता को खो देने और 14 साल की उम्र में स्कूल से निकाले जानेवाले कोयंबटूर के मुरुगनाथम ने सस्ते सैनिटरी नैपकिन को बनाने का ही अपने जीवन का लक्ष्य बना डाला. पहली बार उन्होंने पत्नी को एक पैड बनाकर दिया और इस्तेमाल करके बताने को कहा. उन्होंने प्रयोग करने के लिए दूसरी महिलाओं से बात करने की ठानी. आम महिलाएं नैपकिन प्रयोग कर नहीं रही थीं तो ऐसा करने में कतराई. उन्होंने किसी तरह मेडिकल कॉलेज की 20 लड़कियों को राजी किया पर फीडबैक शीट्स पर उन्होंने अपना फीडबैक ठीक से नहीं दिया. तीन लड़कियों ने सबके फॉर्म भर डाले.




low cost santary napkins machine
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परेशान मुरुगनाथम ने अब खुद पर प्रयोग करने की ठानी. उन्होंने फुटबॉल ब्लैडर निकाल कर एक नकली गर्भाशय बनाया. अपने एक कसाई दोस्त से लेकर उसमें बकरी का खून भरा. सैनिटरी नैपकिन बनाकर खुद पहना. इसके बाद वो साइकिल चलाने जैसा काम करके देखने लगे ताकि दबाव पड़ने से खून बहे और वो नैपकिन को टैस्ट कर सके. ये सब मालूम पड़ने पर दोस्तों और पड़ोसियों ने मुरुगनाथम से दूरी बनानी शुरू कर दी. कोई गाली देता तो कोई मज़ाक बनाता. खुद उनकी पत्नी डेढ़ साल बाद घर छोड़कर चली गई, लेकिन  मुरुगनाथम ने प्रयोग जारी रखना नहीं छोड़ा.




अब उन्होंने सोचा कि इस्तेमाल किए हुए सैनिटरी नैपकिन देखे जाएं और मालूम किया जाए कि वो कामयाब क्यों हैं? उन्होंने मेडिकल कॉलेज की लड़कियों से उनके इस्तेमाल किए जा चुके नैपकिन मांगे. वे  चुपके से घर के पीछे जाकर इस्तेमाल सैनटरी नैपकीन पर शोध करते. उनके इस सनक से परेशान होकर एक दिन उनकी मां भी उन्हें छोड़ कर चली गई. मोहल्ले में भी उनका विरोध बढ़ने लगा. माना गया कि मुरुगनाथम पर कोई भूत सवार है और तांत्रिक से इलाज कराया जाए. सारे विरोध को झेलते हुए किसी तरह उन्होंने अपना काम जारी रखा.

बार-बार असफल मुरुगनाथम ने अब नैपकिन बनानेवाली कंपनियों से ही पूछना शुरू किया कि वो नैपकिन कैसे बनाती हैं? उसने मालूम कर लिया कि नैपकिन में सिर्फ कॉटन नहीं होती बल्कि पेड़ की छाल से निकले सैल्युलोज़ का इस्तेमाल भी होता है, लेकिन दिक्कत ये थी कि ऐसा नैपकिन बनाने के लिए ज़रूरी मशीन बहुत महंगी थी. साढ़े चार साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने ऐसी छोटी मशीनें बना लीं जो किसी तरह सस्ता सैनिटरी नैपकिन बना लेती थीं. Low cost sanitary napkins बनाने के साथ अब वो ऐसा तरीका विकसित करना चाहते थे जिससे महिलाएं इस काम को सीख जाएं और उन्हें इस काम की अच्छी कीमत भी मिल सके.

Arunachalam Muruganantham making low cost sanitary napkins
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वे अपनी लकड़ी की बनी अपनी मशीन को आईआईटी मद्रास ले गए और काम दिखाया. मल्टीनेशनल के सामने अपनी लकड़ी की मशीन से लोहा लेने के उनके जज़्बे से वैज्ञानिक हक्के बक्के थे. आईआईटी मद्रास के नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड कांपिटीशन में 943 मशीनों में मरुगनाथम की मशीन नंबर वन थी. तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब मुरुगनाथम को सम्मानित किया तो ये ड्रॉप आउट अचानक ही सुर्खियों में आ गए.

साढ़े 5 साल बाद उसकी पत्नी का पहला फोन आया. वो वापस घर आना चाहती थी. कुछ वक्त बाद वे ढ़ाई सौ मशीनों के साथ खड़ा थे जिन्हें उन्होंने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और यूपी पहुंचा दिया. उनके सामने चुनौती थी कि पूर्वाग्रहों और शर्म से भरे इन इलाकों में महिलाओं को इन मशीनों और सैनिटरी नैपकिन के बारे में कैसे बताए? हार ना माननेवाले मुरुगनाथम ने धीरे-धीरे ये भी किया और जल्दी ही 23 प्रदेशों के 1300 गांव में उनकी मशीन चमत्कार करने लगी.

नैपकिन बनानेवालों ने खुद ही उसे बेचना शुरू कर दिया. यहां तक कि बदले में महिलाओं ने पैसों के बदले घर का सामान तक खरीदने लगीं. एनजीओ और महिलाओं के दूसरे संगठन आगे आने लगे. एक मशीन की कीमत 75 हज़ार रुपए थी. हर मशीन एक दिन में 200-250 नैपकिन बनता जिससे प्रति नैपकिन ढ़ाई रुपए का बेचा गया. हर ग्रुप ने खुद अपना ब्रांड नेम चुना और पैक करके बेचना शुरू कर दिया. मुरुगनाथम ने स्कूलों को ये नैपकिन उपलब्ध करा दिए. Low cost sanitary napkins अब देश से बाहर निकलकर केन्या, नाइजीरिया, मॉरिशस, फिलीपींस, बांग्लादेश जा पहुंचा.

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