…फिर ऐसी कहानी ना लिखनी पड़े

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चंचल पासवान
चंचल पासवान

प्रतिभा ज्योति:

एसिड अटैक सर्वाइवर चंचल पासवान ने इस क्रूर समाज को आखिर छोड़ दिया. बिहार में पटना के पास दानापुर के छितनामा गांव की बहादुर लड़की ने 22 जून को आखिरी सांस ली .अपने पर एसिड से हुए हमले और अन्याय के ख़िलाफ़ चंचल पांच साल तक लड़ती रही, लेकिन उसके अपराधियों को वो सज़ा नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी. चंचल के पिता शैलेश पासवान ने कहा कि वो आखिरी दम तक बहादुरी से लड़ती रही, लेकिन अब मैं हार गया हूं. मुझे अफसोस है कि मेरी बेटी को मैं न्याय नहीं दिला सका. 




मेरी किताब “एसिड वाली लड़की “ पर काम करते हुए चंचल पासवान से मुलाकात हुई थी. मैं उससे मिलने उसके घर दानापुर गई थी और उसके हौसले को देखकर दंग रह गई थी. जब किताब रिलीज हुई तो वो बहादुर लड़की एक हज़ार किलोमीटर का सफर पार करके दिल्ली आ गई थी. उस समारोह में भी चंचल ने कहा था कि उसकी और एसिड अटैक के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वालों की असली जीत तब होगी जब समाज में फिर से किसी को चंचल ना बनना पड़े.

चंचल अपने नाम से विपरीत गंभीर स्वभाव की थी. अनपढ़, गरीब मजदूर परिवार की इस बेटी की सपना था कम्प्यूटर इंजीनियर बनना, वो कम्प्यूटर कोर्स भी कर रही थी. वो और उसकी बहन सोनम दोनों शिद्दत से शिक्षा के जरिए अपनी जिंदगी के अंधेरे को दूर करने में लगे थी. वो पढ़ना चाहती थी लेकिन बिहार के समाज में एक दलित लड़की का पढ़ना लिखना और आगे बढ़ना किसी को गवारा नहीं था. मौहल्ले के चार लड़कों के लिए तो वो सिर्फ एक लड़की, एक जवान शरीर. एक दलित लड़की का इस तरह आगे बढ़ना किसी को गवारा नहीं था लेकिन रोज-रोज की छींटाकशी, ताने और छेड़खानी को सहते हुए भी चंचल को आगे बढ़ने की जिद थी. एक लड़के ने उसे साथ भाग जाने को कहा, उसने मना कर दिया क्योंकि वो पढ़ना चाहती थी. उसे यह एहसास तक नहीं था उसकी इस ना का अंजाम एसिड अटैक  के रुप में इतना खतरनाक होगा.




2012 में अक्टूबर की हल्की सर्द रातों में दुर्गा पूजा के उत्सव की गर्माहट महसूस हो रही थी. 21 अक्टूबर की रात जब वो अपने घर की छत पर बहन सोनम के साथ सो रही थी तो वो चारों लड़के आए और दो ने उसके हाथ पैर पकड़े, मुंह दबाया और एक ने बोतल से निकाल कर कटोरे में भर कर उस पर एसिड उंडेल दिया.

 

चंचल पासवान @ acid wali ladki book launch
चंचल पासवान @ acid wali ladki book launch

लगा कि खौलता हुआ तेल उस पर उड़ेला जा रहा है. उसके चिल्लाने की आवाज़ से सुनकर जब मां  सुनयना और पिता शैलेश जब तक छत पर भागे तो देखा, चंचल बुरी तरह छटपटा रही थी . उसके चेहरे से धुंआ निकल रहा था. जैसे मोमबत्ती पिघलती है,उस तरह चंचल का चेहरा और पूरा शरीर पिघल रहा था. दूसरी बहन सोनम का भी हाथ और सीना जख्मी हो गया था. आंगन में लिटा कर बाल्टी भर-भर कर पानी डाल तपिश कम करने की कोशिश की. उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ? पिता मदद के लिए मोहल्ले की तरफ भागे लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आया. मानो पूरा मोहल्ला बुत बन गया था.ज़िंदा शरीरों के बुतों का मोहल्ला था वो. कोई आगे नहीं आया. वो उन्हें अस्पताल लेकर भागे..भागते रहे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल. पटना के सबसे बड़े पीएमसीएच अस्पताल पहुंचे. चंचल को आईसीयू में रखना ज़रूरी था लेकिन दो ज़िंदा इंसानों को मुर्दाघर में रखा गया क्योंकि आईसीयू सिर्फ वीवीआईपी लोगों के लिए होता है.




लंबी लड़ाई लड़ी पूरे परिवार ने. कुछ एनजीओ ने साथ दिया, कानूनी लड़ाई भी लड़ी . थोड़ी मदद मिली, थोड़ी नहीं मिली. बिहार के एनजीओ परिवर्तन केन्द्रकी वर्षा जावलेगकर और दिल्ली में एसिड अटैक कैंपेन चलाने वाले आलोक दीक्षित ने मदद की .चंचल के वकील सुरेश प्रसाद मिश्रा कानूनी लड़ाई लड़ते रहे. लेकिन अदालत ने एक आरोपी को कम उम्र का मानते हुए एक साल की सज़ा दी, बाल सुधार गृह में भेज दिया गया उसे और वो अब चंचल के घर के सामने से शान से निकलता है अंगूठा दिखाते हुए, चरमराती न्याय व्यवस्था को और गिलगले समाज को.  गांव वालों ने चंचल पासवान जज़्बे को भले ही सलाम नहीं किया हो मगर बहादुर चंचल फिर से कालेज जाने लगी थीचंचल तो अब नहीं है. मुझसे अक्सर उसकी फोन पर बात होती तो कहती दीदी मैं अपनी पढ़ाई नहीं छोडूगीं चाहे कुछ भी हो जाए.

अब भी अगर आप जाग गए हैं, आपकी और हमारी आत्मा हमे कचोट रही है तो बस इतनी कोशिश कीजिए कि अब फिर किसी को चंचल की तरह से ना गुजरना पड़े .फिर कोई चंचल नहीं बने. याद रखिए, चंचल पासवान हमेशा दूसरे या पड़ोसी के घर की लड़की नहीं होती वो आपके घर में भी हो सकती है. यह चेतावनी है तो आप सिर्फ मोमबत्ती मत जलाइए, दिल्ली के राजपथ और इंडिया गेट पर सिर्फ खड़े मत होइए. बोलिए, लड़िए, मदद कीजिए और कोशिश कीजिए कि फिर ऐसी कहानी ना लिखनी पड़े.

वुमनिया की तरफ से चंचल को श्रद्धांजलि और हम उसके परिवार के साथ खड़े हैं.

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