कैसे भीड़ ने उसे निकाल फेंका?

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श्रुति गौतम:

स्टेशन पर मेट्रो के रुकते ही उसकी मासूम आंखें देख रही थी मेट्रो को. वो समझ पाती कि उससे पहले ही भीड़ ने उसे धक्का दे सवार कर दिया मेट्रो पर.  उसके सिर पर एक  गठरी थी.  वो धक्के खाती हुई एक कोने में रुक गयी. मैंने देखा कि वो सिमटती जा रही है उसी कोने में, दूसरों से बचने की कोशिश में लगातार खुद को समेटती हुई.  उसमें एक असुरक्षा की भावना थी शायद  या शायद गांव से आई उस औरत को समझाया गया था शहर के बारे में कुछ ऐसा कि वो एक स्त्री होकर भी बचना चाहती थी उस लेडीज डब्बे की स्त्रियों से.

गठरी को कसकर पकड़े वो खड़ी थी.  मैं देख रही थी दूसरों की टेढ़ी होती नजरें, कोने में धसती जा रही स्त्री के लिए.  वो नजरें ही तो थी जो लगातार उसे मजबूर कर रही थी सिमटने को.  मैं खुद छोटे शहर से इस महानगर में आई हूं इसलिए उसकी इस असहजता को समझ सकती थी.

यह मेरे लिए चौंकाने वाला था कि पढ़ी-लिखी सशक्त महिलाओं के बीच एक गांव की अशिक्षित स्त्री इतनी असुरक्षा महसूस कर रही थी. यूं मैं देखती रही हूं सभ्य समाज का रवैया गांव के लोगों के लिए. उस वक़्त उस स्त्री पर दया से ज्यादा, गुस्सा आ रहा था उन पढ़ी लिखी डिग्रीधारी स्त्रीवादी महिलाओं पर.  

मैं इसी उधेड़बुन में थी कि मैट्रो ने अगला स्टेशन आने की खबर दी.  वो अपनी गठरी को ले दबे पांव आगे बढ़ रही थी कि अचानक एक नौकरीपेशा लड़की पीछे से शताब्दी एक्सप्रेस की तरह आई और उसे एक तरफ हाथ से झटका देती आगे बढ़ गई.  वह गिर गई पास से निकलती स्त्रियों पर. उसका गिरना था कि दूसरी लड़कियां उसे हिकारत से देखती हुई ऐसे हाथ पांव चलाने लगी जैसे किसी ने बाल्टी भर कीचड़ डाल दिया हो उन पर.  इस वक़्त उस मासूम महिला की हालत बिलकुल बकरी के सामने आने वाले मेमने जैसी थी. वो नहीं जानती थी कि अगले पल उसके साथ क्या होने वाला है?  मैंने उस वक़्त भी उसे अपनी गठरी को कसकर पकड़े हुए देखा.  भीड़ इतनी थी कि मेरा उस तक पहुंचना नामुमकिन था.  वो संभालने में लगी ही थी खुद को कि एक आधुनिका बोल उठी “कहां-कहां से आ जाते हैं ना जाने, ऐसे लोगों की वजह से ही अब मेट्रो में भी गन्दगी होने लगी है, इन लोगों को तो चढने ही नहीं देना चाहिए, जाहिल कहीं के.” इतना सुन वो स्त्री सूनी निगाहों से भक देखने लगी उसे. मैं उसके पीछे थी. अब तक भीड़ ने निकाल फेंका था उसे मेट्रो से बाहर उसकी मंजिल पर .

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