मौका मिले तो क्यों देखें DHARAVI और HORSES OF GOD

0 views
Dharavi and Horses of God
Dharavi and Horses of God

प्रितपाल कौर:

(Senior Journalist, Writer)

दिल्ली में इन दिनों चल रहे आठवें राष्ट्रीय जागरण फिल्म सामरोह में चुनिन्दा भारतीय और अन्तराष्ट्रीय फिल्मों को देखने का मौका मिल रहा है. इसमें दो फिल्में  ‘Dharavi’  और ‘Horses of God’  देखने का मौका मिला. इन दोनों फिल्मों की चर्चा बेहद ज़रूरी है क्योंकि ये दोनों ही फ़िल्में समाज के उस तबके की नुमाइंदगी करती हैं जो अक्सर अभावों में ज़िन्दगी बसर कर देता है. इन लोगों के हालात बदलने के लिए कोई भी  सरकार या राजनैतिक ताकत कुछ ख़ास कदम नहीं  उठाती. फिर यही वजह बनती है उन लोगों तक Anti Social Elememt के पहुंचने की.  उन्हें उस दुनिया के सब्ज़ बाग़ दिखाने की और फिर इन्हें अपनी गिरफ्त में ले कर अपना उल्लू साधने की.

पहले हम ज़िक्र करें  मुंबई की सबसे बड़ी झोपड़-पट्टी धारावी पर इसी  नाम से बनी फिल्म का. 1993 में बनी यह फिल्म जिसका निर्देशन Sudhir Mishra ने किया और फिल्म में ओम पुरी और शबाना आजमी ने मुख्य भूमिकाएं निभायी है.  यह फिल्म एक ऐसे couple की कहानी है जो धारावी में रहता है. पत्नी अपनी ज़िंदगी से मुतमईन है, लेकिन पति जो कि उत्तर प्रदेश के एक गांव से बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में मुंबई आया है, आगे बढ़ना चाहता है.




MUST READ:क्या साल की सबसे CONTROVERSIAL फिल्म होगी LIPSTICK UNDER MY BURKHA?

इसी के चलते वह अपनी सारी कमाई एक छोटी सी फैक्ट्री में लगाता है, कुछ पैसा उधार भी लेता है और कुछ दोस्तों से लेता है. लेकिन एक दिन यह गैर कानूनी तौर पर चल रही फैक्ट्री तोड़ दी जाती है और पैसा न चुका पाने के कारण उसकी टैक्सी भी हाथ से निकल जाती है. ऐसे में वह अपनी निष्ठाओं को छोड़ खुद अपराध कर बैठता है और असामाजिक तत्वों की गिरफ्त में आ जाता है. आखिर में सब कुछ गंवा बैठता है. पत्नी उसे छोड़ कर अपने पहले बीमार पति के पास चली जाती है. मां वापिस गांव चली जाती है. एक दंगे में उसकी गिरवी रखी हुयी टैक्सी भी जला दी जाती है. वह फिर एक बार अपनी उसी धारावी की एक खोली में अपने बेटे के साथ अकेले रहते हुए किराये की टैक्सी चलाने को मजबूर है. लेकिन वो अब भी हार मानने को तैयार नहीं. अब भी नए सिरे से वैसी ही एक और फैक्ट्री के लिए ज़मीन खरीदने के जोश में है. इस बार उसे इस बात की तसल्ली है कि इस बार अनुभव उसके साथ है, इसलिए वह धोखा नहीं खायेगा.




अब बात करें 201 3  में बनी मोरक्को की  फिल्म ‘Horses of God ‘ की. 2003 में कैसाब्लांका में हुए बम धमाकों पर आधारित एक उपन्यास ‘द स्टार्स ऑफ़ सिदी मौमेन’ पर बनी इस फिल्म के निर्देशक हैं नाबिल अयौच. कहानी 1994 में शुरू होती है. ये फिल्म एक गांव के पिछड़े इलाके के बच्चों की चुलबुली शरारतों के साथ शुरू होते हुए कई तरह की आपराधिक गतिविधियों में बदल जाती है. एक गरीब घर की कहानी है जिसका बड़ा लड़का मंद्बुद्धि है, पिता बीमार रहता है. दूसरा लड़का देश से बाहर  जा चुका है बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में.  तीसरे नंबर का हामिद अपनी काली सफ़ेद कमाई से घर में खाना भी लाता है और देर सवेर आने पर मां को परफ्यूम ला कर खुश भी करता है ताकि उसकी डांट न कहानी पड़े. इसके अलावा सबसे छोटे याचिन पर भी निगरानी रखता है. याचिन का दोस्त है नबील जिसकी मां गांव के शादी- ब्याह में नाच गा कर और वेश्यावृति कर के अपना घर चलाती है.

हामिद शराब पी कर इसी नबील का बलात्कार करता है. 1994 तक ये सब युवा हो चुके हैं और हामिद ड्रग डीलर बन चुका है. एक पुलिस अफसर पर पत्थर फेंकने की घटना के बाद हामिद जेल भेज दिया जाता है. इधर याचिन को संतरे बेचने के लिए बाज़ार में गुंडों के जगह नहीं देने के बाद नबील उसे भी अपने साथ ही गांव के गैराज में मैकेनिक की नौकरी दिलवा देता है.

 




MUST READ: जो औरत का दर्द नहीं समझता, भगवान उसे मर्द नहीं समझता’

11 सितम्बर के बाद हामिद को जेल से छोड़ दिया जाता है और वह अपने साथ इस्लामिक कट्टरपंथियों को लेकर गांव लौटता है. वह खुद उनके पूरे प्रभाव में है. इस्लाम का फर्माबरदार हो गया है. ये लोग धीरे धीरे गांव के युवा लड़कों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. याचिन के हाथों गैराज के मालिक के अचानक हुए क़त्ल के बाद यही लोग इनकी मदद करते हैं. अब ये तीनों लड़के और गांव के दूसरे नौजवान भी पूरी तरह इन्हीं के प्रभाव में हैं. ये सभी जन्नत में अपने एक ख़ास  सीट बुक करवाने की राह पर चल पड़े हैं. 

फिल्म में बेहद खूबसूरती के साथ ये बात बुनी गयी है कि कैसे आहिस्ता- आहिस्ता एक पारंपरिक हंसते खेलते समाज में सिर्फ उसकी मुफलिसी और अज्ञान की वजह से इस्लामिक कट्टरपंथ अपनी सेंध लगाता है और पूरा गांव इसकी गिरफ्त में आ जाता है.

धारावी भारत में बनी 1993 में और ‘हॉर्सेज ऑफ़ गॉड’ बनी मोरोक्को में 201 3 में. दोनों समाजों की परम्पराएं अलग है, गरीबी का स्तर भी अलग-अलग है लेकिन एक बात दोनों में उभर कर आती है कि ज़लालत और ग़ुरबत किस तरह मनुष्य का मनोबल तोड़ कर उसे अपराध की तरफ मोड़ देती है. ये दोनों ही सन्दर्भ कितने अन्तरराष्ट्रीय हैं ये इन दोनों फिल्मों को देख कर महसूस किया जा सकता है. आखिर पूरी दुनिया में इंसानियत के दुश्मनों के खून का रंग भी लाल ही पाया जाता है.

 

 

 

 

Facebook Comments