गुलाबी रंग में रंगे ECONOMIC SURVEY का स्याह पक्ष-बेटियां आगे बढ़ीं पर नहीं खत्म हो रहा ‘पुत्र मोह’

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Economic Survey
Economic survey 2017-18 in pink colour

महिलाओं की तरक्की और उनकी उपलब्धियों को बताने के लिए इस बार Economic Survey गुलाबी रंग में रंगा गया. लेकिन गुलाबी रंग में रंगे इस Economic Survey का स्याह पक्ष यह है कि बेशक महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं लेकिन लोगों का पुत्र मोह खत्म नहीं हो रहा.




सोमवार को संसद में पेश किए इकॉनोमिक सर्वे में कन्या नहीं, पुत्र चाहिए-क्या विकास ही इस समस्या का समाधान है-शीर्षक से एक चैप्टर में कहा गया है कि लड़कियों के बुलंदियों के छूने के बाद भी लोगों से पुत्र मोह नहीं छूट रहा. इस वजह से सामाजिक-आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है.

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1-सर्वे में कहा गया है कि बेटे की चाहत में अभिभावक गर्भधारण के उपाय नहीं अपनाते और इसके कारण कई बार अनचाही बेटियां पैदा हो जाती हैं. देश में साल भर में 2.1 करोड़ अनचाही बेटियां पैदा हो रही हैं. यानी अनचाही बेटियों को बोझ माना जाता है.  47फीसदी महिलाएं किसी भी तरह के गर्भ निरोधक का इस्तेमाल नहीं करतीं.




2-बेटे की चाहत में लोग Selective Abortion करा रहे हैं यानी यदि गर्भ में बेटी हुई तो उसे मार दिया जाता है. एक अनुमान है कि 6.3 करोड़ लड़कियां गुमशुदा हो गईं. इन्हें पैदा होना चाहिए था पर नहीं हो पाईं.




3-सर्वे में महिलाओं के रोजगार की खराब होती स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. इसमें कहा गया है कि 10 साल पहले के मुकाबले महिलाओं के लिए रोजगार घटे हैं और इसमें गिरावट आई है. 2005-06 में महिला रोजगार 36 फीसदी था जो अब घटकर 24 फीसदी रह गया है.

4-सर्वे के मुताबिक दस साल में केवल 10फीसदी अतिरिक्त महिलाएं ही शिक्षा ही ग्रहण कर पाई हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तह की प्रगति भारत ने कारोबार सुगमता की रैंकिंग में की है उसी तरह लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए प्रयास करने होंगे.

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5-इकॉनोमिक सर्वे में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की 49फीसदी आबादी होने के बाद भी उनकी राजनीतिक भागीदारी कम है. इसकी बड़ी वजह है कि महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियां और समाज और परिवार में उनकी भूमिका को लेकर पारंपरिक सोच है.

हालांकि 2010 से 2017 के बीच लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी में एक फीसदी का इजाफा हुआ है लेकिन इसमें खुश होने जैसी कोई बात नहीं. जबकि रवांडा जैसे देश की संसद में 60फीसदी से अधिक महिला प्रतिनिधि है.

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