स्कूल यूनिफॉर्म में SKIN COLOUR की ब्रा कितना सही कितना ग़लत?

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Skin colour
DPS Rohini asks girl to wear skin colour bra (Representational Image)

रीवा सिंह:

हाल ही में राजधानी के जाने-माने स्कूल डीपीएस, रोहिणी ने यह फ़रमान जारी किया है कि कक्षा नौ से बारह तक की लड़कियां Skin Colour की ही Bra पहनकर आएं और ब्रा के ऊपर समीज भी पहनें, जिसके बाद लड़कियों के कपड़ों को लेकर गढ़े गये टैबूज़ पर फिर से बात शुरू हुई है.




याद आता है कि अमरीका में एक बार एक ब्यूटी कॉन्टेस्ट को लेकर सौंदर्य के जबरन थोपे गये पैमाने के विरोध में महिलाओं ने सड़क पर निकलकर अपनी ब्रा जला डाली थी.

पिछले वर्ष भारतीय साहित्य कला परिषद ने एक नाटक का मंचन सिर्फ़ इसलिए नहीं होने दिया था क्योंकि उसमें ‘ब्रा’ शब्द का इस्तेमाल था और निर्णायक इसे ‘बीप’ करना चाहते थे.

चूंकि उस नाटक के लिए वहां ‘ब्रा’ शब्द ज़रूरी था इसलिए उसे ‘बीप’ नहीं किया जा सका और नाटक का मंचन रोक दिया गया. इसके विरोध में दिल्ली यूनिवर्सिटी की उस नाट्य-टीम ने अपने कॉलेज के दीवारों पर ब्रा टांगकर भर दी थी.




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न केवल भारतीय समाज में बल्कि वैश्विक स्तर पर ब्रा जैसे मामूली और सामान्य वस्त्र को कामुकता के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. स्कूल में Skin Colour की ब्रा थोपने का कोई मतलब नहीं था.

जो लोग इसे अनुशासन के नाम पर उचित बता रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि कपड़े के रंग का अंतःवस्त्र बहुत मौलिक चीज़ है. यदि आप सफ़ेद शर्ट पहनते हैं तो सफ़ेद बनियान या सफ़ेद ब्रा ही पहनते हैं.




जिस स्कूल में स्किन कलर की ब्रा नियम बन गयी है वहां की यूनिफ़ॉर्म स्किन कलर की नहीं है, फिर स्किन कलर की ब्रा क्यों? क्योंकि हम लड़कों पर नकेल कसे बिना लड़कियों को सुरक्षित रखना चाहते हैं, यह भूलाकर कि ऐसी सुरक्षा अधूरी है.

रीवा सिंह

ग़ौरतलब है कि उसी स्कूल में ग्यारहवीं की एक टीचर कहती हैं कि वहां बच्चों को पढ़ाना दुश्वार हो जाता है. उन्होंने अपने साथ हुई घटना का ज़िक्र करते हुए कहा कि एक बार क्लास में वो पढ़ा रही थीं और पीछे से लड़के फुसफुसा रहे थे – दिखा, दिख रही है…

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वह टीचर सकपका गयीं और तुरंत अपना दुपट्टा ठीक किया, फिर उन्होंने वॉशरूम में जाकर देखा तो सब ठीक था. एक टीचर के लिए अगर इतनी चुनौती है तो लड़कियां वहां किस तरह पढ़ती होंगी यह सोचनीय है.

ऐसे में अनुशासन का सारा बीड़ा लड़कियों के हवाले छोड़ देना बिल्कुल वैसा ही है जैसे जंगल में शेर को नहीं रोक सकते तो मेमने को छिपाते रहें.

हमें किसी को शिकारी और शिकार नहीं होने देना है. दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन स्कूलों को समानता की अलख जलानी थी वो जड़ में भी जंगलराज स्वीकार कर नियम थोप रहे हैं.

 

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